वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद (Protectionism) के बीच, भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक चाल चली है। देश ने हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका (US) और यूरोपीय संघ (EU) के साथ दो महत्वपूर्ण व्यापार समझौते फाइनल किए हैं, जिसने भारत की आर्थिक दिशा को नई राह दी है। इन पहलों को ऊर्जा आयात की रणनीति में बदलाव के साथ जोड़ा गया है, ताकि देश की आर्थिक सुरक्षा और विकास को मजबूती मिल सके।
US के साथ इंटरिम एग्रीमेंट: टैरिफ में बड़ी कटौती
अमेरिका ने भारत पर लगने वाले अपने टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया है। यह फैसला 7 फरवरी 2026 से लागू हो गया है और यह एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) की ओर पहला कदम है। इसके तहत, भारत अगले पांच सालों में अमेरिका से $500 बिलियन से अधिक के उत्पाद खरीदेगा, जिसमें एनर्जी, टेक्नोलॉजी और एग्रीकल्चर सेक्टर शामिल हैं।
EU के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट: 90% से ज्यादा सामानों पर जीरो-टैरिफ
वहीं, यूरोपीय संघ के साथ भारत ने एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (Free Trade Agreement) को अंतिम रूप दिया है। इस समझौते से दोनों के बीच 90% से ज्यादा सामानों पर टैरिफ खत्म हो जाएगा। खास बात यह है कि भारत को EU बाजारों में अपने 97% निर्यात पर जीरो-टैरिफ एक्सेस मिलेगा, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए यूरोप का बड़ा बाजार खुल जाएगा। इस डील से 2032 तक भारत का एक्सपोर्ट दोगुना होने की उम्मीद है।
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने की कवायद
इन व्यापारिक समझौतों के साथ-साथ, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कच्चे तेल (Crude Oil) के आयात स्रोतों में बड़ा बदलाव कर रहा है। देश अब रूस पर निर्भरता कम करते हुए अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देशों से तेल का आयात बढ़ा रहा है। यह कदम ऊर्जा की खरीद को किफायती और सुरक्षित बनाने के साथ-साथ जियोपॉलिटिकल कंडीशन (Geopolitical Conditions) को भी ध्यान में रखकर उठाया गया है। भारत की यह रणनीति किसी एक आपूर्तिकर्ता (Supplier) पर निर्भरता कम करने और बाजार की मौजूदा परिस्थितियों का लाभ उठाने पर केंद्रित है।
ग्लोबल प्रोटेक्शनिज़्म का जवाब
ये रणनीतिक कदम वैश्विक स्तर पर बढ़ते संरक्षणवाद (Protectionism) की पृष्ठभूमि में देखे जा रहे हैं। भारत इन नीतियों से उत्पन्न सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन (Supply Chain Diversification) के अवसरों का लाभ उठाना चाहता है। जबकि चीन वैश्विक व्यापार में हावी है, भारत सेवाओं (Services Exports) के निर्यात में अच्छी वृद्धि दिखा रहा है। EU-India FTA भारतीय श्रम-प्रधान क्षेत्रों (Labour-Intensive Sectors) के लिए एक बड़ा अवसर है। अमेरिका के साथ हुआ समझौता, पिछले साल अगस्त 2025 में लगाए गए 50% के ऊंचे टैरिफ की स्थिति को बदलने में मदद करेगा, जो रूसी तेल खरीद जैसे मुद्दों से जुड़ा था।
⚠️ संभावित जोखिम और चुनौतियां
इन समझौतों से भले ही उम्मीद जगी हो, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण जोखिम भी मौजूद हैं। कच्चे तेल के आयात स्रोतों में बदलाव से नई सप्लाई चेन की अस्थिरता (Volatility) और बाजार की कीमतों में बढ़ोतरी का खतरा बढ़ सकता है, क्योंकि डिस्काउंटेड रूसी तेल की खरीद कम हो रही है। भारत अपनी करीब 80-88% क्रूड ऑयल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिससे अर्थव्यवस्था वैश्विक मूल्य झटकों (Price Shocks) और जियोपॉलिटिकल रुकावटों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका के साथ $500 बिलियन की खरीद का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है और इसे पूरा न कर पाने की स्थिति में भविष्य में व्यापारिक तनातनी बढ़ सकती है। इसके अलावा, वैश्विक संरक्षणवाद की नीतियां भारत के MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) की निर्यात क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।
आगे का रास्ता
विश्लेषकों का मानना है कि इन समझौतों का भारत की आर्थिक वृद्धि पर सकारात्मक असर पड़ेगा। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने 2026 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.9% रहने का अनुमान लगाया है, जिसमें अमेरिकी टैरिफ में कमी और आसान वित्तीय शर्तों को मुख्य कारण बताया गया है। एचएसबीसी (HSBC) का कहना है कि व्यापार में प्रगति, राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) और रुपए का अवमूल्यन (Undervalued Rupee) एक मजबूत निवेश परिदृश्य की ओर इशारा करते हैं। अमेरिका-भारत के बीच व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की चल रही बातचीत और EU FTA का क्रियान्वयन भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा, हालांकि वैश्विक अनिश्चितताओं और ऊर्जा बाजार की गतिशीलता को सावधानी से संभालना महत्वपूर्ण होगा।