सरकार अपने रेवेन्यू (Revenue) को बढ़ाने और फिस्कल प्रेशर (Fiscal Pressure) को कम करने के लिए यह कदम उठा रही है। नई दरें लागू होने के बाद, हाई-स्पीड डीजल पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (Special Additional Excise Duty) अब ₹24 प्रति लीटर हो गई है, वहीं रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस (Road and Infrastructure Cess) बढ़कर ₹36 प्रति लीटर कर दिया गया है। सरकार को उम्मीद है कि इससे उनके खजाने में अच्छी खासी रकम आएगी, खासकर तब जब चालू फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) जीडीपी (GDP) का करीब 5.5% रहने का अनुमान है।
लेकिन इस फैसले का सीधा असर आम जनता पर पड़ने वाला है। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा संबंध महंगाई (Inflation) से रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईंधन की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में 50-75 बेसिस पॉइंट का इजाफा हो सकता है। खास तौर पर ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर इसका बड़ा असर होगा। लॉजिस्टिक्स और ट्रकिंग कंपनियां पहले से ही डीजल की बढ़ी कीमतों से परेशान हैं। उनके मुताबिक, भाड़े (Freight Rates) में 5-8% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका मतलब है कि खेतों से मंडी तक और फैक्ट्रियों से दुकानों तक पहुंचने वाले सामान महंगे हो जाएंगे, जिससे खुदरा (Retail) और कृषि (Agriculture) जैसे कई सेक्टरों में कीमतें बढ़ेंगी।
हालांकि, सरकार को इससे तत्काल राजस्व तो मिलेगा, लेकिन इसके अपने रिस्क भी हैं। डीजल के महंगे होने से लोगों की खर्च करने की क्षमता पर असर पड़ेगा, जिससे गैर-जरूरी सामानों की मांग घट सकती है। यह एक ऐसा चक्र बना सकता है जहाँ धीमी व्यावसायिक गतिविधि से टैक्स रेवेन्यू और कम हो जाए, और सरकार को और टैक्स बढ़ाने पड़ें या फिर उधार लेना पड़े। जिन बिजनेसेज का ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज़्यादा निर्भरता है, वे लंबी अवधि में लागत बढ़ने की समस्या झेलेंगे। सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह फंड की तत्काल जरूरत और अर्थव्यवस्था की रिकवरी को धीमा करने या महंगाई बढ़ाने के जोखिम के बीच संतुलन कैसे बनाए।