महंगाई पर सरकार का पैंतरा, RBI की चुनौती?
वित्त मंत्रालय (Finance Ministry) ने साफ कर दिया है कि भारत अगले सात सालों तक, यानी मार्च 2031 तक, महंगाई दर को 4% पर रखने का लक्ष्य बनाए रखेगा। इस लक्ष्य के लिए 2% से 6% का सहिष्णुता बैंड (tolerance band) भी जारी रहेगा। यह भारत की आर्थिक स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
लेकिन, दुनिया भर में, खासकर मध्य-पूर्व (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इससे भारत में ईंधन, खाद और अन्य जरूरी सामानों के दाम बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। यह स्थिति महंगाई को काबू में रखने के RBI के प्रयासों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
RBI पर दबाव, विकास पर असर?
यह बाहरी झटका, जिसे 'एनर्जी शॉक' भी कहा जा रहा है, सीधे तौर पर महंगाई के लक्ष्य को खतरे में डाल सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें सप्लाई में रुकावट के डर से $90-$100 प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
ऐसे में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को कड़े मौद्रिक नीति (monetary policy) अपनाने पर मजबूर होना पड़ सकता है, जबकि देश का आर्थिक विकास (economic growth) भी धीमा पड़ रहा है। ऊपर से, वैश्विक अनिश्चितता के कारण भारतीय रुपये (Indian rupee) पर भी दबाव बढ़ा है, जिससे आयात महंगा हो रहा है और नीति निर्माताओं के लिए मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
विकास और महंगाई के बीच संतुलन
मंत्रालय के नोटिफिकेशन से अगले पांच सालों के लिए 4% का महंगाई लक्ष्य पक्का हो गया है। हालांकि, वैश्विक भू-राजनीतिक हालात, खासकर मध्य-पूर्व का संघर्ष, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव ला रहा है।
अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि लगातार ऊंची तेल कीमतों के कारण RBI को ब्याज दरें (interest rates) बढ़ाने पर विचार करना पड़ सकता है, भले ही भारत की जीडीपी वृद्धि (GDP growth) पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रही हो। फाइनेंशियल ईयर 2026-2027 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि का अनुमान लगभग 6.5%-7.0% के आसपास है, लेकिन इसमें महंगाई और वैश्विक मंदी का जोखिम बना हुआ है।
इसके अलावा, तेल की बढ़ती लागत के कारण आयात बिल बढ़ने से भारत के चालू खाते का घाटा (current account deficit) भी बढ़कर जीडीपी का 2.5%-3.5% तक पहुंच सकता है। इससे RBI की मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) के सामने मुश्किल विकल्प हैं: महंगाई से लड़ने के लिए दरें बढ़ाएं, जिससे विकास धीमा हो सकता है, या दरों को कम रखें, जिससे महंगाई और कमजोर करेंसी का जोखिम बढ़ेगा। माना जा रहा है कि अमेरिकी डॉलर (US dollar) के मुकाबले भारतीय रुपया (Indian rupee) 83-85 के बीच कारोबार कर सकता है, और अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसमें और गिरावट आ सकती है।
वैश्विक परिदृश्य और जोखिम
भारत की यह चुनौती उन अन्य उभरते बाजारों (emerging markets) के लिए भी समान है जो बढ़ती ऊर्जा लागत और वैश्विक स्तर पर सख्त होती मौद्रिक नीतियों से जूझ रहे हैं। भारत तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील है। ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के कारण भारतीय करेंसी कमजोर हुई है, बॉन्ड यील्ड्स बढ़े हैं और केंद्रीय बैंक पर दरें बढ़ाने का दबाव आया है।