भारत, ASEAN देशों के साथ अपने बढ़ते **$45.2 बिलियन** के ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटे) को कम करने के लिए AITIGA ट्रेड एग्रीमेंट की समीक्षा कर रहा है। सरकार भारतीय निर्यात के लिए बेहतर बाज़ार पहुंच (Market Access) की मांग कर रही है और साथ ही टैरिफ (Tariff) में सोच-समझकर कटौती पर भी विचार कर रही है। यह कदम एक ऐसे समझौते को आधुनिक बनाने का लक्ष्य रखता है, जिसमें 2010 में लागू होने के बाद से भारत का व्यापार असंतुलन काफी बढ़ गया है।
AITIGA समझौते में बड़े फेरबदल की तैयारी
केंद्र सरकार ASEAN-India Trade in Goods Agreement (AITIGA) की शर्तों में सुधार के लिए अहम बातचीत कर रही है। इसका मुख्य मकसद दस देशों वाले इस समूह के साथ भारत के $45.2 बिलियन के व्यापार घाटे को कम करना है। यह आंकड़ा 2010 के मुकाबले काफी ज्यादा है, जब यह समझौता पहली बार लागू हुआ था और तब घाटा करीब $7 बिलियन था। नई दिल्ली का मानना है कि इस समीक्षा से समझौते को मौजूदा आर्थिक हालातों के मुताबिक ढाला जा सकेगा और घरेलू निर्माताओं के हितों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।
टैरिफ (Tariff) में कटौती और इंडस्ट्री की राय
वाणिज्य विभाग (Department of Commerce) फिलहाल विभिन्न घरेलू उद्योगों से सलाह-मशविरा कर रहा है ताकि यह तय किया जा सके कि किन उत्पाद श्रेणियों (Product Categories) में टैरिफ कम किए जा सकते हैं। रणनीति यह है कि उन सामानों पर व्यापार बाधाओं को चुनिंदा रूप से कम किया जाए, जिनमें भारतीय कंपनियां प्रतिस्पर्धी (Competitive) हैं और नेट एक्सपोर्टर (Net Exporter) हैं। अधिकारी खास तौर पर उन उत्पादों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिन पर अन्य व्यापार समझौतों के तहत पहले ही उदारता दिखाई जा चुकी है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि नई छूटों से स्थानीय उत्पादन को नुकसान न पहुंचे। उन सेक्टर्स को टारगेट करके, जहाँ चीन की ASEAN बाज़ारों में बड़ी इंपोर्ट शेयर (Import Share) वाली पकड़ नहीं है, भारत क्षेत्रीय व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है।
रूल्स ऑफ ओरिजिन (Rules of Origin) और सुरक्षा उपायों पर फोकस
वर्तमान बातचीत का एक बड़ा हिस्सा 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' से जुड़े नियमों की खामियों को दूर करना है। भारतीय अधिकारियों ने चिंता जताई है कि मौजूदा समझौते का इस्तेमाल तीसरे पक्ष के देशों, खासकर चीन से, कम कीमत वाले सामानों को भारतीय बाज़ार में पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। इन नियमों को मजबूत करके, सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि तरजीही टैरिफ (Preferential Tariff) लाभ केवल ASEAN सदस्य देशों में उत्पन्न होने वाले सामानों के लिए ही आरक्षित रहें। यह पहल समझौते को आधुनिक बनाने और मौजूदा व्यापार लाभों के दुरुपयोग को रोकने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।
निवेशक (Investors) और बाज़ार के जानकारों की नज़रें इन वार्ताओं की प्रगति पर टिकी रहेंगी। मुख्य रूप से, टैरिफ में बदलाव के लिए चुनी गई वस्तुओं की अंतिम सूची, सख्त 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' लागू करने की समय-सीमा, और यह कि नया समझौता भारतीय कंपनियों के लिए निर्यात की मात्रा को कितना बेहतर बनाता है, ये सब देखने वाली बातें होंगी। चूंकि व्यापार समझौते सीधे तौर पर आयात पर निर्भर उद्योगों के मुनाफे (Profit Margins) और निर्यातकों के बाज़ार तक पहुँच को प्रभावित करते हैं, इसलिए इन वार्ताओं का अंतिम परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न विनिर्माण (Manufacturing) और निर्यात-उन्मुख (Export-Oriented) क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा।
