India Private Sector Growth: जून में रफ्तार धीमी, 3 महीने का सबसे कमजोर स्तर

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AuthorAditya Rao|Published at:
India Private Sector Growth: जून में रफ्तार धीमी, 3 महीने का सबसे कमजोर स्तर

भारत के प्राइवेट सेक्टर की ग्रोथ जून महीने में धीमी पड़ गई है। जून में कंपोजिट PMI **57.4** रहा, जो मई के **59.3** से कम है। कमोडिटी और नई ऑर्डर्स में आई सुस्ती का असर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों पर दिखा है। इसके चलते जॉब क्रिएशन में भी 6 महीने की सबसे बड़ी गिरावट आई है। हालांकि, लागत दबाव कम हुआ है, लेकिन यह मंदी कॉर्पोरेट कमाई के लिए चिंता का सबब बन सकती है, क्योंकि प्रोडक्शन करने वाली कंपनियों का बिजनेस कॉन्फिडेंस कई सालों के निचले स्तर पर चला गया है।

क्या हुआ?

HSBC Flash India Composite Purchasing Managers' Index (PMI) के अनुसार, जून में भारत के प्राइवेट सेक्टर की ग्रोथ रेट में कमी आई है। यह इंडेक्स मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज में मंथली बिजनेस एक्टिविटी को ट्रैक करता है। जून में यह 57.4 पर आ गया, जबकि मई में यह 59.3 था। 50.0 से ऊपर का कोई भी आंकड़ा एक्सपेंशन (Growth) दर्शाता है, लेकिन यह गिरावट पिछले 3 महीनों की सबसे धीमी ग्रोथ रेट है। नई ऑर्डर्स में कमी आने के कारण मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज, दोनों सेक्टर इस मंदी का शिकार हुए हैं।

डिमांड का महत्व

इन्वेस्टर्स के लिए, नए ऑर्डर्स भविष्य की रेवेन्यू के लीडिंग इंडिकेटर होते हैं। यह डेटा दिखाता है कि नए बिजनेस में ग्रोथ मार्च के बाद से सबसे कमजोर रही है। कंपनियों ने नए बिजनेस जीतने में मुश्किल की वजह कड़ी मार्केट कंपटीशन और गैस सप्लाई जैसी ऑपरेशनल दिक्कतों को बताया है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर इसका असर ज्यादा देखा गया, जहां एक्सपोर्ट ऑर्डर्स मार्च 2023 के बाद सबसे खराब स्थिति में रहे। वहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा, यानी सर्विसेज PMI, 17 महीनों के निचले स्तर 57.3 पर आ गया। जब डिमांड ग्रोथ कम होती है, तो कंपनियों को आने वाली तिमाहियों में हाई वॉल्यूम ग्रोथ बनाए रखने में दिक्कत हो सकती है, जो कि लिस्टेड कंपनियों के लिए एक अहम पैमाना है।

मार्जिन और लागत का समीकरण

कॉर्पोरेट बैलेंस शीट्स के लिए एक राहत की बात यह है कि लागत का दबाव लगातार तीसरी बार कम हुआ है। बिजनेसेज में इनपुट कॉस्ट इन्फ्लेशन (कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी) कम हुई है, जो जनवरी के बाद सबसे कम है। हालांकि, इससे सीधे तौर पर प्रॉफिट नहीं बढ़ा है।

क्योंकि डिमांड का माहौल ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो रहा है, कंपनियों के लिए ग्राहकों से ज्यादा दाम वसूलना मुश्किल हो रहा है। सेलिंग प्राइस इन्फ्लेशन (बिक्री की कीमतों में बढ़ोतरी) काफी कम हुई है, यानी बिजनेस अपनी लागत को बढ़ाए बिना चीजों को बेच रहे हैं। अगर यह ट्रेंड जारी रहता है, तो इन्वेस्टर्स यह देख सकते हैं कि क्या इससे ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव पड़ेगा, क्योंकि कंपनियां कॉम्पिटिटिव माहौल में अपनी मार्केट हिस्सेदारी बचाने के लिए प्रॉफिटेबिलिटी से समझौता कर सकती हैं।

हायरिंग और बिजनेस कॉन्फिडेंस

जून में प्राइवेट सेक्टर में जॉब क्रिएशन (नई नौकरियां) मामूली रही, जो पिछले 6 महीनों में सबसे कमजोर हायरिंग ग्रोथ है। रिक्रूटमेंट को लेकर यह सतर्क रवैया बताता है कि बिजनेस डिमांड के और स्पष्ट संकेत मिलने का इंतजार कर रहे हैं, इससे पहले कि वे अपनी वर्कफोर्स बढ़ाएं।

इसके अलावा, प्रोडक्शन सेक्टर में बिजनेस कॉन्फिडेंस लगभग 4 सालों के निचले स्तर पर चला गया है। हालांकि यह सेंटिमेंट बदल सकता है, कॉन्फिडेंस में लगातार गिरावट से कैपिटल स्पेंडिंग (पूंजीगत खर्च) में कमी आती है, क्योंकि कंपनियां ऑर्डर्स की मजबूत रिकवरी देखने से पहले फैक्ट्री एक्सपेंशन या नए प्रोजेक्ट्स को टाल सकती हैं या कम कर सकती हैं।

निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

इन्वेस्टर्स को आने वाले तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए, ताकि यह देखा जा सके कि PMI डेटा में आई यह मंदी रेवेन्यू और मार्जिन परफॉर्मेंस में दिखती है या नहीं। सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि क्या लागत में नरमी, कमजोर डिमांड के असर को बॉटम-लाइन प्रॉफिटेबिलिटी पर ऑफसेट कर पाती है। इसके अलावा, आने वाले महीनों में एक्सपोर्ट ऑर्डर्स और हायरिंग के ट्रेंड्स से यह पता चलेगा कि जून की यह मंदी एक अस्थायी झटका है या एक्टिविटी में कूलिंग का एक लंबा दौर शुरू हो रहा है।

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