भारत में बिजली की मांग ने जुलाई 2026 के शुरुआती दिनों में **10.7%** की रफ्तार पकड़ी है। इसकी मुख्य वजह मॉनसून का देरी से आना और गर्मियों में कूलिंग की बढ़ती जरूरत है। बढ़ी हुई मांग के कारण इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) पर बिजली की स्पॉट कीमतें औसतन **₹7** प्रति यूनिट तक पहुंच गई हैं, जो थर्मल पावर उत्पादकों के लिए सप्लाई-डिमांड के टाइट बैलेंस का संकेत दे रही हैं।
Detailed Coverage
गर्मी का प्रचंड रूप, बिजली की मांग आसमान पर!
देरी से आए मॉनसून और लगातार बनी हुई उमस ने गर्मी के मौसम को लंबा खींच दिया है, जिसके चलते भारत का पावर सेक्टर जबरदस्त मांग के दौर से गुजर रहा है। जुलाई 2026 के पहले पखवाड़े में बिजली की खपत में पिछले साल की तुलना में 11% का उछाल आया है। यह वही ट्रेंड है जो जून में भी देखने को मिला था, जब खपत 11.6% बढ़ी थी। इस जबरदस्त मांग के कारण देश में पीक डिमांड (Peak Demand) ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। 16 जुलाई 2026 को देश ने 270.20 GW की रिकॉर्ड पीक डिमांड दर्ज की, जो मई 2026 में दर्ज 270.82 GW के ऑल-टाइम हाई से बस थोड़ी ही कम है।
स्पॉट पावर प्राइस में रिकॉर्ड उछाल
सप्लाई और डिमांड के बीच कसावट का अंदाजा आप स्पॉट बिजली बाजार से लगा सकते हैं। 16 जुलाई 2026 को इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) पर बिजली की स्पॉट कीमतें औसतन ₹7 प्रति यूनिट रहीं। यह जून 2026 के औसत ₹5.2 प्रति यूनिट और जुलाई 2025 के ₹4.2 प्रति यूनिट के मुकाबले काफी बड़ी छलांग है। इस भारी बढ़ोतरी की मुख्य वजह एयर कंडीशनिंग की बढ़ती मांग और मॉनसून पर निर्भर हाइड्रोलॉक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स (Hydroelectric Projects) से बिजली उत्पादन में आई कमी है।
कोयला सप्लाई और इन्वेंटरी का हाल
भारत की बिजली का एक बड़ा हिस्सा सप्लाई करने वाले थर्मल पावर प्लांट्स (Thermal Power Plants) अपने कोयला स्टॉक (Coal Inventory) पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं। 18 जुलाई 2026 तक, पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक करीब 13 दिनों की सप्लाई के लिए पर्याप्त था। हालांकि यह जून के अंत में 14.3 दिनों के स्तर से थोड़ा कम है, लेकिन पिछले सालों के मुकाबले यह बेहतर स्थिति है। यह तब है जब फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY2027) के तीसरे महीने में डोमेस्टिक कोयला उत्पादन 5.9% गिरा है। डोमेस्टिक प्रोडक्शन की इस कमी को पावर सेक्टर के लिए खासतौर पर इस्तेमाल होने वाले कोयले की सप्लाई में 0.5% की मामूली साल-दर-साल बढ़ोतरी से कुछ हद तक पूरा किया गया है।
निवेशकों के लिए, सरकारी खदानों से कोयला उत्पादन में रिकवरी और सप्लाई लेवल की स्थिरता पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। हालांकि मौजूदा इन्वेंटरी लेवल सरकार के 20 दिनों के बफर नॉर्म (Buffer Norm) से कम हैं, लेकिन ये अल्पावधि ऑपरेशंस के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन, अगर प्रोडक्शन में कोई और रुकावट आती है, तो प्लांट्स को महंगे इंपोर्टेड कोयले (Imported Coal) या स्पॉट पावर पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है, जिससे पावर जेनरेशन कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। बाकी बचे फाइनेंशियल ईयर के लिए आउटलुक इस बात पर निर्भर करेगा कि पीक बिजली मांग की तेज ग्रोथ के मुकाबले क्षमता विस्तार (Capacity Addition) कितनी जल्दी रफ्तार पकड़ता है।
