इस साल 2026 की पहली छमाही में भारत में बिजली की कमी दोगुनी से ज़्यादा हो गई है। गर्मी की लहरें (Heatwaves) और इंडस्ट्री से बढ़ती मांग के कारण पीक लोड **270.8 GW** तक पहुंच गया। पावर ग्रिड पर लगातार दबाव बना हुआ है।
Detailed Coverage
2026 की पहली छमाही में बिजली संकट*
साल 2026 की पहली पांच महीनों में भारत में बिजली की कमी पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में दोगुनी से ज़्यादा हो गई है। इसकी मुख्य वजह इंडस्ट्री से बढ़ी हुई मांग और भयंकर गर्मी की लहरें (Heatwaves) रही हैं, जिसने राष्ट्रीय ग्रिड पर अभूतपूर्व दबाव डाला है। डेटा के अनुसार, बिजली की खपत में लगभग 6% की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें अकेले मई महीने में 11% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई।
ग्रिड पर बढ़ता दबाव और पीक लोड मैनेजमेंट*
18 से 21 मई, 2026 के बीच पावर ग्रिड पर सबसे ज़्यादा दबाव देखा गया, जब लगातार चार दिनों तक भारत में रिकॉर्ड 270.8 गीगावाट (GW) की पीक बिजली मांग दर्ज की गई। भले ही देश थर्मल और रिन्यूएबल एनर्जी सोर्स (खासकर दिन के उजाले में सोलर पावर) को बढ़ा रहा है, लेकिन शाम के समय बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पावर प्लांट्स को तेज़ी से उत्पादन बढ़ाना पड़ा। ग्रिड को स्थिर बनाए रखने के लिए कोयला और गैस आधारित बिजली उत्पादन पर भारी निर्भरता रही।
क्षेत्रीय बिजली आपूर्ति पर असर*
पूरे देश में बिजली की कमी का असर एक समान नहीं रहा। उत्तरी क्षेत्र (Northern Region) में सबसे ज़्यादा ऊर्जा की कमी महसूस की गई। अप्रैल के महीने में पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे राज्यों को उनकी मासिक बिजली ज़रूरतों का 2% तक पूरा करने में भी मुश्किल हुई। बढ़ती गर्मी और उमस के कारण कूलिंग की मांग में 7% की बढ़ोतरी देखी गई, जिससे सप्लाई और डिमांड के बीच का यह अंतर क्षेत्रीय वितरण प्रणालियों की कमज़ोरी को उजागर करता है।
भविष्य का अनुमान और मांग के मुख्य कारक*
साल 2026 के बाकी बचे महीनों के लिए, बिजली की मांग में लगभग 7% की तेज़ी जारी रहने का अनुमान है। आर्थिक विकास और अर्थव्यवस्था के ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्रों के बिजली पर निर्भर होने के कारण यह बढ़ोतरी अपेक्षित है। हालांकि, मौसम का मिजाज अभी भी अनिश्चितता का एक बड़ा स्रोत बना हुआ है। ग्यारह सालों में सबसे कम बारिश के अनुमान और अल नीनो (El Niño) की बढ़ती ताक़त के कारण जुलाई से सितंबर तक तापमान ज़्यादा रहने और सामान्य से कम बारिश होने की उम्मीद है।
निवेशकों और बाजार पर नज़र रखने वालों के लिए, कोयला सप्लाई चेन की विश्वसनीयता और पीक लोड को संभालने में बिजली वितरण कंपनियों की क्षमता पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा, जुलाई-सितंबर के दौरान पवन ऊर्जा उत्पादन में संभावित गिरावट और जलविद्युत क्षमता (hydropower capacity) की सीमाओं से ग्रिड की मज़बूती की और परीक्षा हो सकती है। दूसरे छमाही में औद्योगिक और वाणिज्यिक संचालन को बनाए रखने के लिए बढ़ती मांगों को पूरा करने और सप्लाई की कमी से बचने की क्षेत्र की क्षमता महत्वपूर्ण होगी।
