भारत की अर्थव्यवस्था ने भरी ऊंची उड़ान
भारतीय अर्थव्यवस्था 6.1% की प्रभावशाली सालाना ग्रोथ के साथ आगे बढ़ी है। यह 2024 में लगभग 2.9% के वैश्विक औसत से काफी आगे है। यह प्रदर्शन चीन (Q1 2026 में 5.0%) और इंडोनेशिया (Q4 2025 में 5.4%) जैसे देशों से भी बेहतर है। इस ग्रोथ का श्रेय भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की 2016 में अपनाई गई फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन टारगेटिंग (FIT) फ्रेमवर्क की सफलता को जाता है। इस पॉलिसी ने औसत महंगाई दर को पहले के 7.4% से घटाकर सितंबर 2016 से दिसंबर 2025 के बीच 4.7% कर दिया है। वहीं, सरकार की फिस्कल नीतियों ने भी मॉनेटरी पॉलिसी के साथ मिलकर इकोनॉमिक स्टेबिलिटी को सपोर्ट किया है।
ग्लोबल जोखिमों का साया
मजबूत डोमेस्टिक परफॉरमेंस के बावजूद, वैश्विक चुनौतियां उम्मीदों पर पानी फेर सकती हैं। पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष एक बड़ी चिंता का विषय है। अगर यह जारी रहा तो इससे भारत के GDP ग्रोथ में करीब 1% की कमी आ सकती है और महंगाई 1.5% तक बढ़ सकती है। भू-राजनीतिक तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर भारत की बड़ी इंपोर्ट कॉस्ट और महंगाई को प्रभावित करती हैं। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने हालांकि भारत के ग्रोथ के अनुमान को बढ़ाकर FY2026-27 के लिए 6.5% कर दिया है, लेकिन उसने इन चुनौतियों का भी जिक्र किया है। IMF का यह अनुमान RBI के 6.9% के अपने अनुमान से कम है, जो अलग-अलग नजरिए को दर्शाता है।
RBI की सावधानी भरी चाल
पिछले एक दशक में भारत का GDP करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर (2015) से बढ़कर 4.3 ट्रिलियन डॉलर (2025 तक अनुमानित) हो गया है। ऐतिहासिक रूप से, 2000 के दशक में भारत की रियल GDP ग्रोथ औसतन 6.3% और 2010 के दशक में 6.6% रही, जो महामारी से पहले के चार वर्षों में बढ़कर 7.7% हो गई थी। महंगाई टारगेटिंग फ्रेमवर्क इस स्टेबिलिटी का मुख्य कारण रहा है, जिसने इसे अपनाने के बाद से औसत महंगाई को पहले के 6.8% से घटाकर 4.9% कर दिया है। सेंट्रल बैंक का न्यूट्रल मॉनेटरी पॉलिसी स्टान्स (जो न तो बहुत आसान हो और न ही बहुत सख्त) मौजूदा जटिल माहौल को देखते हुए एक प्रैक्टिकल तरीका है। यह RBI को बदलते इन्फ्लेशन और ग्रोथ ट्रेंड्स के साथ-साथ बाहरी झटकों के आधार पर पॉलिसी को एडजस्ट करने की फ्लेक्सिबिलिटी देता है। यह डेटा-ड्रिवेन स्ट्रैटेजी का संकेत देता है, जो ट्रेड डिसरप्शन और वोलेटाइल एनर्जी प्राइसेज जैसी वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए महत्वपूर्ण है।
आने वाले जोखिम
मजबूत ग्रोथ के आंकड़ों के बावजूद, कुछ कमजोरियां ध्यान देने योग्य हैं। कच्चे तेल के इंपोर्ट पर भारत की भारी निर्भरता (लगभग 90% जरूरतें इंपोर्ट की जाती हैं) पश्चिम एशिया से भू-राजनीतिक झटकों के प्रति इसे बहुत संवेदनशील बनाती है। एक लंबा संघर्ष महंगाई को और बढ़ा सकता है, जिससे RBI के लिए 4% के अपने टारगेट बैंड (+/- 2%) के भीतर कीमतों को स्थिर रखना मुश्किल हो जाएगा। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय रुपया कमजोर हुआ है, जिससे इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ी है और करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ा है। सरकार ने बफर स्टॉक बढ़ाने और ट्रेड पॉलिसी का इस्तेमाल करने जैसे फिस्कल कदम उठाए हैं, लेकिन सप्लाई में रुकावटें और वोलेटाइल कमोडिटी प्राइसेज पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। महामारी के चरम के बाद से भारत का फिस्कल डेफिसिट कम हुआ है, लेकिन यह अभी भी एक महत्वपूर्ण कारक है जिस पर ध्यान देना होगा। आर्थिक मंदी के कारण सरकारी खर्च में वृद्धि उन जोखिमों को बढ़ा सकती है, जो अन्य देशों ने फिस्कल एक्सपेंशन के दौरान झेले हैं।
आगे की राह
भारत का भविष्य का आर्थिक रास्ता, डोमेस्टिक ग्रोथ बनाए रखते हुए बाहरी जोखिमों को दूर करने पर निर्भर करेगा। IMF और वर्ल्ड बैंक भारत के लिए मजबूत ग्रोथ का अनुमान जारी कर रहे हैं, जो एक प्रमुख वैश्विक इकोनॉमिक खिलाड़ी के रूप में इसकी स्थिति को उजागर करता है। हालांकि, RBI की वर्तमान 'रुको और देखो' वाली रणनीति यह दर्शाती है कि वह समझता है कि स्थायी स्थिरता के लिए वैश्विक अनिश्चितताओं पर सावधानीपूर्वक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। सेंट्रल बैंक महंगाई टारगेट्स और ग्रोथ को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जो आज की अप्रत्याशित वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक कठिन संतुलन है।
