भारत सरकार स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स (SEZs) के लिए 'SEZ 2.0' पॉलिसी रिफॉर्म्स पर विचार कर रही है। इस पहल में डोमेस्टिक मार्केट में ड्यूटी-फ्री बिक्री और रुपी में पेमेंट जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। इसका मकसद SEZs को लोकल इकोनॉमी के साथ बेहतर ढंग से जोड़ना और उनकी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना है।
क्या है 'SEZ 2.0' की कहानी?
भारत के स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स (SEZs) को एक नई दिशा देने की तैयारी है। सरकार का एक 17 सदस्यीय पैनल, जिसमें वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) और नीति आयोग (NITI Aayog) जैसे प्रमुख विभाग शामिल हैं, अगले हफ्ते एक नई पॉलिसी फ्रेमवर्क पर चर्चा के लिए बैठेगा। इस पहल को 'SEZ 2.0' नाम दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य SEZs को सिर्फ एक्सपोर्ट-केंद्रित मॉडल से निकालकर, उन्हें डोमेस्टिक मार्केट के साथ ज़्यादा इंटीग्रेट करना और ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी (operational flexibility) देना है। पैनल इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स (industry stakeholders) से भी सलाह-मशविरा करेगा ताकि ऐसे प्रस्ताव तैयार किए जा सकें जो SEZ यूनिट्स के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव ला सकें।
ये रिफॉर्म्स क्यों ज़रूरी हैं?
सालों से, SEZs का मुख्य मकसद टैक्स हॉलिडे (tax holidays) और ड्यूटी कंसेशंस (duty concessions) के ज़रिए एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना रहा है। लेकिन, प्रमुख डायरेक्ट टैक्स इंसेंटिव्स (direct tax incentives), जैसे सेक्शन 10AA डिडक्शन (Section 10AA deduction) के खत्म होने के बाद, कई SEZ यूनिट्स की कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) पर असर पड़ा है। ये प्रस्तावित रिफॉर्म्स, उन टैक्स बेनिफिट्स की भरपाई के लिए 'ऑपरेशनल' फायदे देने की कोशिश है। SEZs को डोमेस्टिक मार्केट तक आसान पहुंच देकर और उनकी बेकार पड़ी क्षमता का लोकल काम के लिए इस्तेमाल करने की इजाज़त देकर, सरकार इन ज़ोन्स को सिर्फ एक्सपोर्ट हब (export enclaves) बनाने के बजाय ज़्यादा कारगर बिजनेस हब बनाना चाहती है।
मुख्य पॉलिसी प्रस्ताव क्या हैं?
ऑपरेशनल एफिशिएंसी (operational efficiency) को बेहतर बनाने के लिए तीन मुख्य प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है:
- ड्यूटी-फॉरगॉन डोमेस्टिक सेल्स (Duty-foregone domestic sales): सरकार यूनिट्स को डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (DTA) यानी भारत के बाकी हिस्सों में 'ड्यूटी-फॉरगॉन' आधार पर सामान बेचने की इजाज़त देने पर विचार कर रही है। इसका मतलब होगा कि कंपनियां फिनिश्ड गुड (finished good) पर पूरी कस्टम ड्यूटी (custom duty) देने के बजाय, केवल फाइनल प्रोडक्ट में इस्तेमाल किए गए इंपोर्टेड रॉ मैटेरियल (imported raw materials) पर ही ड्यूटी का भुगतान करेंगी। इससे डोमेस्टिक बिक्री की लागत कम हो जाएगी।
- रुपी-डीनॉमिनेटेड पेमेंट्स (Rupee-denominated payments): पैनल एक ऐसे प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है जिससे SEZ यूनिट्स द्वारा डोमेस्टिक एंटिटीज़ (domestic entities) को दी जाने वाली सर्विसेज़ के लिए रुपी में पेमेंट की जा सके। इससे लोकल सर्विस ट्रांजैक्शंस (local service transactions) के लिए कमाई को फॉरेन एक्सचेंज (foreign exchange) में कन्वर्ट करने का बोझ कम होगा और फर्मों के लिए अकाउंटिंग आसान हो जाएगी।
- 'जॉब वर्क' की सुविधा ('Job work' facility): सरकार SEZ यूनिट्स को डोमेस्टिक कंपनियों के लिए 'जॉब वर्क' करने की इजाज़त दे सकती है, जिसमें एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन्स (export obligations) को लिंक करने की ज़रूरत नहीं होगी। इस बदलाव से मैन्युफैक्चरर्स अपनी बची हुई फैक्ट्री कैपेसिटी (spare factory capacity) का इस्तेमाल लोकल इंडियन मार्केट की मांग को पूरा करने के लिए कर सकेंगे, खासकर तब जब ग्लोबल एक्सपोर्ट डिमांड (global export demand) कमजोर हो।
संभावित जोखिम और चुनौतियाँ
भले ही ये बदलाव SEZ टेनेंट्स (SEZ tenants) को फायदा पहुंचा सकते हैं, लेकिन ये इन ज़ोन्स के बाहर काम करने वाले मैन्युफैक्चरर्स के साथ कुछ मुश्किलें पैदा कर सकते हैं। DTA में मौजूद डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स का यह तर्क रहा है कि SEZs को डोमेस्टिक ग्राहकों को बेचते समय ड्यूटी एडवांटेज (duty advantages) देना एक अनइवन प्लेइंग फील्ड (uneven playing field) बनाता है। अगर सरकार इन रिफॉर्म्स के साथ आगे बढ़ती है, तो उसे SEZ की कॉम्पिटिटिवनेस की ज़रूरत और डोमेस्टिक फर्मों की चिंताओं के बीच संतुलन बनाना होगा, जिन्हें ऐसे ही ड्यूटी बेनिफिट्स नहीं मिलते।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
जिन निवेशकों की नज़र उन कंपनियों पर है जिनकी महत्वपूर्ण SEZ ऑपरेशंस (SEZ operations) हैं, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और आईटी सर्विसेज़ जैसे सेक्टर्स में, उन्हें इस कमेटी मीटिंग के फाइनल आउटकम्स पर नज़र रखनी चाहिए। मुख्य रूप से नई पॉलिसी की आधिकारिक घोषणा, ड्यूटी-फॉरगॉन सेल्स के लिए योग्य गुड्स की स्पेसिफिक कैटेगरीज (specific categories) और डोमेस्टिक इंडस्ट्री कॉम्पिटिशन (domestic industry competition) को फेयर बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा लागू किए जाने वाले किसी भी सेफगार्ड (safeguards) पर ध्यान देना होगा। एक स्पष्ट पॉलिसी फ्रेमवर्क उन मैन्युफैक्चरर्स के रिटर्न रेश्यो (return ratios) में सुधार कर सकता है जो वर्तमान में SEZs के अंदर हाई आइडल कैपेसिटी (high idle capacity) के साथ काम कर रहे हैं।
