SEZ 2.0: भारत की नई एक्सपोर्ट पॉलिसी! क्या बदलेगा निर्यात का नक्शा?

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AuthorAditya Rao|Published at:
SEZ 2.0: भारत की नई एक्सपोर्ट पॉलिसी! क्या बदलेगा निर्यात का नक्शा?

भारत सरकार स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) की नीतियों में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। 30 जून को होने वाली एक अहम मीटिंग में 'SEZ 2.0' पॉलिसी पर चर्चा होगी। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि SEZ से होने वाला निर्यात पिछले साल के **$172.07 बिलियन** से घटकर **$133.45 बिलियन** हो गया है। इन बदलावों का मकसद एक्सपोर्ट स्कीम्स को बेहतर बनाना और बिजनेस को आसान करना है।

क्या हुआ है?

कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री ने स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) के पूरे ढांचे को बदलने के लिए 30 जून को एक अहम बैठक बुलाई है। सरकार 'SEZ 2.0' नाम की एक नई पॉलिसी लाना चाहती है ताकि इन ज़ोन्स में धीमी ग्रोथ को रोका जा सके। इस मसले पर सुझाव देने के लिए 17 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई है। यह कमेटी एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने वाली अलग-अलग स्कीम्स, जैसे एक्सपोर्ट ओरिएंटेड यूनिट्स (EOUs), मैन्युफैक्चरिंग एंड अदर ऑपरेशंस इन वेयरहाउस (MOOWR), और दूसरी ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट प्रोग्राम्स को एक साथ लाने के तरीके सुझाएगी।

इस सेक्टर को सुधार की ज़रूरत क्यों है?

इस पॉलिसी में बदलाव की ज़रूरत इसलिए पड़ रही है क्योंकि हाल के दिनों में SEZ का प्रदर्शन गिरा है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में SEZ एक्सपोर्ट घटकर $133.45 बिलियन रह गए, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा $172.07 बिलियन था। SEZs के लिए मौजूदा कानून 2005 का है, जो गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) लागू होने से पहले का है और तब के ग्लोबल ट्रेड के हालात भी आज से काफी अलग थे। ट्रेड के बदलते परिदृश्य के साथ, इन ज़ोन्स में काम कर रही कई कंपनियों को ऑपरेशनल कॉम्प्लेक्सिटी, एक्सपोर्ट से जुड़े सख्त नियम और डोमेस्टिक बिजनेस प्रैक्टिसेस के साथ तालमेल बिठाने में दिक्कतें आ रही हैं।

बिजनेस पर क्या होगा असर?

प्रस्तावित सुधारों का मकसद बिजनेस ऑपरेशंस को आसान बनाना और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बेहतर करना है। चर्चाओं में डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (DTA) को दी जाने वाली सर्विसेज के लिए रुपए में पेमेंट की सुविधा और SEZ यूनिट्स को डोमेस्टिक एंटिटीज के लिए जॉब वर्क करने की अनुमति देने जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया जाएगा, जिसके लिए डायरेक्ट एक्सपोर्ट लिंक की ज़रूरत नहीं होगी। अगर ये बदलाव लागू होते हैं, तो इन ज़ोन्स में काम कर रहे मैन्युफैक्चरर्स और सर्विस प्रोवाइडर्स पर कंप्लायंस का बोझ कम हो सकता है। इसके अलावा, सरकार इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन को बढ़ावा देने के तरीकों पर भी विचार कर रही है, जिससे लोकल यूनिट्स को इंपोर्ट से बेहतर तरीके से मुकाबला करने में मदद मिल सकती है।

कौन प्रभावित होगा?

इन सुधारों का असर मुख्य रूप से दो तरह की लिस्टेड और प्राइवेट कंपनियों पर पड़ेगा। पहला, रियल एस्टेट डेवलपर्स और REITs जो SEZs में जगह के मालिक हैं, ऑपरेट करते हैं या लीज पर देते हैं। दूसरा, SEZs में स्थित एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड मैन्युफैक्चरिंग और आईटी कंपनियां। इन कंपनियों को रेगुलेटरी प्रोसीजर्स में सरलता और ऑपरेशनल गाइडलाइंस में स्पष्टता का फायदा मिल सकता है। एडमिनिस्ट्रेटिव मुश्किलों में कमी आने से अक्सर उनकी ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार होता है।

आगे क्या देखना है?

इन्वेस्टर्स 30 जून की बैठक के नतीजों पर नज़र रख सकते हैं, जिसमें 'SEZ 2.0' रोडमैप के कार्यान्वयन की समय-सीमा और बाकी डिटेल्स सामने आएंगी। कुछ खास बातें जिन पर नज़र रखी जाएगी, उनमें ड्यूटी स्ट्रक्चर में कोई बदलाव, डोमेस्टिक मार्केट तक आसान पहुंच और अलग-अलग एक्सपोर्ट स्कीम्स का इंटीग्रेशन शामिल हैं। जैसे-जैसे सरकार इन सुझावों को अंतिम रूप देगी, ऑपरेशंस की लागत और डोमेस्टिक व एक्सपोर्ट मार्केट के बीच यूनिट्स की फ्लेक्सिबिलिटी का संभावित असर मुख्य फोकस रहेगा।

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