क्या है भारत सरकार का नया प्लान?
सरकार यूरोपीय संघ के 1996 के 'ब्लॉकिंग स्टेट्यूट' (Blocking Statute) का अध्ययन कर रही है। इस कानून का मकसद उन विदेशी कानूनों को लागू होने से रोकना है जो उनके देशों की सीमाओं के बाहर जाकर असर डालते हैं। भारत चाहता है कि ऐसी नीतियां लागू हों जो अंतरराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत में दी जा रही जरूरी सेवाओं को विदेशी प्रतिबंधों के कारण रुकने से बचा सकें। इससे भारत में व्यापार की निरंतरता बनी रहेगी और वैश्विक राजनीतिक फैसलों के कारण भारतीय कंपनियों को परेशानी नहीं होगी।
नायरा एनर्जी का मामला बना वजह
इस पॉलिसी में बदलाव की एक अहम वजह पिछले साल जुलाई में माइक्रोसॉफ्ट का नायरा एनर्जी को IT सर्विस अचानक बंद करना था। यह तब हुआ जब EU ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे और नायरा एनर्जी भी उसी की चपेट में आ गई थी। इस वजह से ऑयल रिफाइनर का आउटलुक (Outlook) और टीम्स (Teams) जैसी जरूरी सर्विस से संपर्क टूट गया था, यहां तक कि उनके लाइसेंस वाले टूल्स और डेटा तक पहुंच भी बंद हो गई थी। इस घटना ने साफ कर दिया कि भारतीय कंपनियां विदेशी डिजिटल सिस्टम पर कितना निर्भर हैं और कितनी कमजोर हैं। नायरा एनर्जी की शिकायत के बाद, वित्त मंत्रालय ने EU के स्टेट्यूट को एक मॉडल बताते हुए इसी तरह का घरेलू कानून बनाने का प्रस्ताव दिया है।
EU का कानून कैसे करता है काम?
यूरोपीय संघ का ब्लॉकिंग स्टेट्यूट 1996 में लागू हुआ था। यह कहता है कि किसी देश की सीमाओं से बाहर जाकर प्रतिबंध लगाना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। यह EU के लोगों और कंपनियों को ऐसे विदेशी प्रतिबंधों का पालन करने से रोकता है, और उन पर आधारित गैर-EU अदालती फैसलों को रद्द कर देता है। साथ ही, यह कंपनियों को हुए नुकसान की भरपाई का अधिकार भी देता है।
भारत में कानून कैसे काम करेगा?
प्रस्तावित कानून के तहत, भारत में रजिस्टर्ड कंपनियों के लिए यह गैरकानूनी होगा कि वे अपने मूल देश या किसी अन्य अधिकार क्षेत्र के प्रतिबंधों का पालन करें। यह कदम अभी सरकारी विभागों के बीच शुरुआती चर्चाओं में है। हालांकि, EU का कानून शुरू में क्यूबा और ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों के लिए बनाया गया था, लेकिन इसे लागू करना मुश्किल साबित हुआ है। कई बार EU की कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों या EU नियमों का पालन करने के बीच मुश्किल चुनाव करने पड़े हैं। वहीं, नई दिल्ली एक ऐसी पॉलिसी पर भी विचार कर रही है जिसके तहत अहम सेक्टरों की कंपनियों को घरेलू स्तर पर बनी क्लाउड सिस्टम का उपयोग करना होगा। इसका मकसद बढ़ते भू-राजनीतिक और साइबर सिक्योरिटी के खतरों के बीच विदेशी प्रदाताओं पर निर्भरता कम करना और डेटा सुरक्षा को मजबूत करना है। माइक्रोसॉफ्ट ने नायरा एनर्जी की घटना पर सफाई देते हुए कहा था कि यह एक ऑटोमेटेड 'लेगेसी' कंप्लायंस सिस्टम के कारण हुआ था और अब इसमें सुधार किया गया है।
