EU कार्बन टैक्स का झटका! भारत MSMEs को देगा 90% सब्सिडी, एक्सपोर्ट को बचाने की तैयारी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
EU कार्बन टैक्स का झटका! भारत MSMEs को देगा 90% सब्सिडी, एक्सपोर्ट को बचाने की तैयारी

यूरोपीय संघ (EU) के नए कार्बन टैक्स, यानी CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) का सामना कर रहे भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को बड़ी राहत मिलने वाली है। सरकार एक ऐसी सपोर्ट स्कीम तैयार कर रही है, जो इन कंपनियों के कंप्लायंस खर्च का 90% तक कवर करेगी। इसका मकसद छोटे एक्सपोर्टर्स को यूरोपीय बाजार में महंगा होने से बचाना है।

क्या हुआ है?

केंद्र सरकार माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) के लिए एक सपोर्ट पैकेज पर काम कर रही है। यह पैकेज यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के तहत आने वाले कंप्लायंस खर्चों को पूरा करने में मदद करेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस नई स्कीम के तहत EU के कार्बन रिपोर्टिंग नियमों को पूरा करने के लिए लगने वाले कुल खर्च का लगभग 90% तक रीइम्बर्स किया जाएगा। यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत के छोटे एक्सपोर्टर्स के लिए EU से छूट मांगने की कोशिशें नाकाम रही हैं और अब उन्हें इन अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मानकों का सामना करना पड़ रहा है।

कंप्लायंस का भारी बोझ

कई छोटे भारतीय व्यवसायों के लिए सबसे बड़ी चिंता कार्बन टैक्स नहीं, बल्कि रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन का भारी खर्च है। EU को स्टील या एल्युमीनियम जैसे सामान एक्सपोर्ट करने के लिए, कंपनियों को अपने कार्बन उत्सर्जन का प्रमाणित डेटा देना होगा। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि हर छोटे यूनिट के लिए कार्बन अकाउंटिंग सेट अप करने, थर्ड-पार्टी ऑडिटर हायर करने और डिजिटल रिपोर्टिंग सिस्टम लागू करने का शुरुआती खर्च ₹15 लाख से ₹20 लाख तक आ सकता है। यह रकम कई छोटी फर्मों के लिए काफी ज्यादा है और यह उनके प्रोडक्ट्स को यूरोपीय बाजार में कॉम्पिटिटिव बनाने वाले प्रॉफिट मार्जिन को खत्म कर सकती है।

'डिफॉल्ट वैल्यूज' का छिपा हुआ टैक्स

अगर कोई एक्सपोर्टर अपने उत्सर्जन का सटीक, वेरिफाइड डेटा नहीं दे पाता है, तो EU नियमों के अनुसार टैक्स की गणना के लिए 'डिफॉल्ट वैल्यूज' का इस्तेमाल किया जाएगा। ये डिफॉल्ट वैल्यूज जानबूझकर ऊंचे स्तर पर रखी जाती हैं ताकि कंपनियां सटीक रिपोर्टिंग के लिए प्रोत्साहित हों। सबसे अहम बात यह है कि आने वाले सालों में ये वैल्यूज और बढ़ेंगी: 2026 में 10%, 2027 में 20% और 2028 से 30%। इसका मतलब है कि अगर कोई MSME आज रिपोर्टिंग सिस्टम का खर्च नहीं उठा सकता, तो भविष्य में उसे अपने माल पर लगातार ज्यादा टैक्स पेनल्टी का सामना करना पड़ेगा, जिससे वे यूरोपीय बाजार से बाहर हो सकते हैं।

खतरे में कौन से सेक्टर?

CBAM का असर सभी इंडस्ट्रीज पर एक जैसा नहीं होगा। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के आंकड़ों से पता चलता है कि आयरन और स्टील सेक्टर सबसे ज्यादा दबाव में रहने की संभावना है, जिसके एक्सपोर्ट में EU के लिए 24% तक की गिरावट आ सकती है। एल्युमीनियम प्रोडक्ट्स और फर्टिलाइजर्स जैसे अन्य उद्योग भी जांच के दायरे में हैं। ये सेक्टर भारत के एक्सपोर्ट बास्केट के लिए महत्वपूर्ण हैं, और इन सप्लाई चेन में छोटे प्लेयर्स की EU की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता लंबे समय तक ट्रेड वॉल्यूम बनाए रखने में एक बड़ा फैक्टर होगी।

आगे क्या देखें?

निवेशकों को इस सरकारी सब्सिडी स्कीम के औपचारिक लॉन्च पर नजर रखनी चाहिए, खासकर यह जानने के लिए कि कौन से सेक्टर कवर किए जाएंगे और फंड कैसे वितरित किए जाएंगे। साथ ही, यूनाइटेड किंगडम द्वारा प्रस्तावित अपने कार्बन बॉर्डर टैक्स के बारे में आने वाले अपडेट्स पर भी ध्यान दें, जिसके 2027 में शुरू होने की उम्मीद है। अगर वैश्विक बाजार ऐसे तंत्रों को अपनाना जारी रखते हैं, तो भारतीय एक्सपोर्टर्स - बड़े और छोटे दोनों - की लागत-प्रभावी, पारदर्शी कार्बन रिपोर्टिंग लागू करने की क्षमता उनके दीर्घकालिक एक्सपोर्ट स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक होगी।

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