Excellence Enablers के सर्वे के नतीजे भारत के सरकारी उपक्रमों (PSUs) में गवर्नेंस की गंभीर चुनौतियों को उजागर करते हैं। ये सिर्फ छोटे-मोटे मुद्दे नहीं, बल्कि ऐसे सिस्टम से जुड़ी समस्याएं हैं जो निवेशकों के भरोसे को हिला सकती हैं और इन बड़ी कंपनियों के भविष्य को धूमिल कर सकती हैं।
सेक्टर की वैल्यूएशन पर सवाल
पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (PSE) इंडेक्स, जिसमें भारत की सरकारी कंपनियां शामिल हैं, पिछले एक साल में 18.45% से 25.58% तक बढ़ा है। लेकिन, सर्वे में सामने आई गवर्नेंस की कमजोरियां इस परफॉर्मेंस पर सवाल खड़े करती हैं। ONGC जैसी बड़ी महा-रत्न कंपनी, जिसकी मार्केट कैप लगभग ₹3.52 लाख करोड़ और P/E रेश्यो करीब 8.7 है, और Coal India, जिसकी वैल्यूएशन करीब ₹2.7 लाख करोड़ और P/E रेश्यो करीब 9.3 है, भी इस श्रेणी में आती हैं। NTPC की मार्केट कैप करीब ₹3.70 लाख करोड़ है। ये वैल्यूएशन भले ही आकर्षक लगें, लेकिन गवर्नेंस की लगातार बनी हुई खामियों से पता चलता है कि इनमें छिपे जोखिम अभी मार्केट में पूरी तरह से शामिल नहीं हैं। सर्वे में यह भी पाया गया कि FY24-25 में केवल 13 कंपनियों ने ही बोर्ड इवैल्यूएशन (Board Evaluation) किया, जिसमें से एक ने ही सभी जरूरी कैटेगरी का मूल्यांकन किया।
गवर्नेंस बनाम ग्रोथ: एक गहरी पड़ताल
स्टडीज बताती हैं कि भारत में गवर्नेंस सुधारों ने ऐतिहासिक रूप से PSU के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस और मार्केट कैप को बेहतर बनाया है। लेकिन, यह नया सर्वे बताता है कि अहम क्षेत्रों में सुधार रुका हुआ है या पीछे जा रहा है। FY25 में 36 महा-रत्न और नवरत्न कंपनियों में पर्याप्त इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की कमी बोर्ड की निगरानी की क्वालिटी और माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स के हितों की सुरक्षा पर सीधा असर डालती है। इसके अलावा, 17 कंपनियों में कोई महिला डायरेक्टर नहीं थी, जो बोर्ड की विविधता (Board Diversity) में कमी को दर्शाता है। इससे स्ट्रेटेजिक सोच (Strategic Perspective) सीमित हो सकती है।
संभावित जोखिम का विश्लेषण
इन गवर्नेंस मुद्दों का लगातार बने रहना गहरी स्ट्रक्चरल समस्याओं की ओर इशारा करता है। लाभ कमाने के लक्ष्य और सामाजिक कल्याण के सरकारी निर्देशों के बीच टकराव अक्सर ऐसी स्थिति पैदा करता है जहाँ गवर्नेंस के नियमों को गौण माना जाता है। सरकारी दखलअंदाजी और मैनेजरियल ऑटोनॉमी (Managerial Autonomy) की कमी, जो अक्सर PSU के विश्लेषण में सामने आती है, फैसलों को धीमा कर सकती है और जवाबदेही को कम कर सकती है। 31 कंपनियों में से 28 में व्हिसलब्लोअर की शिकायतें शून्य होना बेहद चिंताजनक है; यह किसी समस्या-मुक्त माहौल का संकेत नहीं, बल्कि यह बता सकता है कि शिकायतें करने के तरीके भरोसेमंद या सुलभ नहीं हैं। ऑडिट कमिटी की मीटिंग्स का पर्याप्त बार (एक साल में चार से कम) न होना भी दर्शाता है कि मैनेजमेंट सुधार से ज्यादा कंप्लायंस (Compliance) को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे ये बड़ी कंपनियां बड़े ऑपरेशनल और फाइनेंशियल जोखिमों के संपर्क में आ सकती हैं।
भविष्य की राह
हालांकि सरकार ने विभिन्न सुधार और महा-रत्न व नवरत्न जैसे दर्जे देकर स्वायत्तता (Autonomy) दी है, लेकिन Excellence Enablers की रिपोर्ट बताती है कि ये कदम मूलभूत गवर्नेंस की कमियों को पूरी तरह से दूर करने में सफल नहीं हुए हैं। भविष्य में, PSU बैंकों के लिए 'बैंकिंग गवर्नेंस बिल' जैसे प्रस्तावित सुधारों से इन मुद्दों से निपटने का इरादा दिखता है। लेकिन, बाकी PSU क्षेत्र के लिए, असली सुधार तब होंगे जब ऐसे गहरे स्ट्रक्चरल बदलाव होंगे जो राजनीतिक प्रभाव से डायरेक्टरों की स्वतंत्रता बढ़ाएंगे और सिर्फ रेगुलेटरी पालन से आगे जाकर जवाबदेही की संस्कृति को बढ़ावा देंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, निवेशक इन महत्वपूर्ण आर्थिक संस्थाओं की लॉन्ग-टर्म वैल्यू क्रिएशन (Long-term Value Creation) क्षमता के बारे में सतर्क रह सकते हैं।