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India PMI: भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बड़ी मार! 45 महीने के निचले स्तर पर पहुंचा PMI, महंगाई और सप्लाई चेन संकट की दस्तक

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India PMI: भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बड़ी मार! 45 महीने के निचले स्तर पर पहुंचा PMI, महंगाई और सप्लाई चेन संकट की दस्तक
Overview

हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में आई गड़बड़ी के कारण भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भारी दबाव देखा जा रहा है। इन सब वजहों से इनपुट कॉस्ट (input costs) में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है और महंगाई (inflation) बढ़ गई है, जिसके चलते मार्च 2026 में परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) **45 महीने** के निचले स्तर **53.8** पर पहुँच गया।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई भारी गिरावट

भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मार्च 2026 में बुरी तरह लड़खड़ा गया। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे अहम शिपिंग रूट पर बढ़ती अस्थिरता ने चीजों को और बिगाड़ दिया है। इस संकट की वजह से कच्चे माल और ऊर्जा की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे लागत (costs) बढ़ गई है और महंगाई (inflation) में भी इजाफा हुआ है। इस स्थिति ने भारत की इम्पोर्ट पर निर्भर सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर कर दिया है।

सेक्टर की परफॉरमेंस में आई बड़ी गिरावट

परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का विस्तार मार्च 2026 में घटकर 53.8 रह गया, जो कि फरवरी 2026 के 56.9 से काफी कम है। यह पिछले 45 महीनों में सबसे धीमी ग्रोथ है। आउटपुट ग्रोथ (output growth) भी अगस्त 2021 के बाद सबसे कम रही। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने से ऊर्जा और कच्चे माल की सप्लाई चेन में बाधा आई है। इनपुट कॉस्ट (input costs) 45 महीने के उच्च स्तर पर पहुँच गई, जबकि आउटपुट प्राइस (output prices) भी तेजी से बढ़े। इससे कंपनियों के मुनाफे (profits) पर दबाव बढ़ा है और उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

ग्लोबल लेवल पर पिछड़ रहा भारत

दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत का मैन्युफैक्चरिंग PMI अब पिछड़ने लगा है। उदाहरण के लिए, मार्च 2026 में अमेरिका का मैन्युफैक्चरिंग PMI 52.7 पर रहा, जो लगातार तीसरे महीने विस्तार को दर्शाता है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो, भारत का वर्तमान PMI सितंबर 2021 (53.7) के बाद सबसे कम है। यह दिखाता है कि सेक्टर की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है। यह स्थिति तब है जब भारत ने Q3 FY26 के लिए 7.82% की मजबूत GDP ग्रोथ दर्ज की थी, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग को एक मुख्य ड्राइवर बताया गया था। अब यह भू-राजनीतिक संकट उस प्रगति को खतरे में डाल सकता है।

सप्लाई चेन की कमजोरी का खुलासा

हॉर्मुज जलडमरूमध्य में आई रुकावटों का भारत के इम्पोर्ट पर निर्भर सेक्टरों पर गहरा असर पड़ा है। भारत अपने कच्चे तेल (crude oil) का 40-50% और LNG का 50-60% इसी रास्ते से इम्पोर्ट करता है। संकट से पहले, कुल कच्चे तेल सप्लाई का लगभग 57% इसी मार्ग से गुजरता था। इससे ब्रेंट क्रूड (Brent crude) और LNG की कीमतें बढ़ गई हैं, जिसका असर ऑयल रिफाइनरी, फर्टिलाइजर निर्माता और बासमती चावल निर्यातकों पर भी पड़ रहा है। डीजल, पेट्रोल और LPG की सप्लाई में कमी आ रही है, वहीं लॉजिस्टिक्स और रिफाइनरी में भी दिक्कतें हैं। नेचुरल गैस के आवंटन में कटौती से ऊर्जा-गहन उद्योगों, जैसे एल्युमीनियम कैन मैन्युफैक्चरिंग, पर भी असर पड़ा है। Confederation of Indian Industry (CII) ने जरूरी कच्चे माल की देरी और कमी की रिपोर्ट दी है।

इकोनॉमिक इम्पैक्ट और महंगाई का खतरा

विश्लेषक अब 'स्टैगफ्लेशन' (stagflation) के बड़े खतरे की चेतावनी दे रहे हैं। स्टैगफ्लेशन का मतलब है धीमी आर्थिक ग्रोथ के साथ-साथ ऊंची महंगाई। ऐसे में महंगाई दर 6-7% के पार जा सकती है। अगर कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है, तो भारत का इम्पोर्ट बिल $13-14 बिलियन बढ़ सकता है और कंज्यूमर इन्फ्लेशन 0.3-0.4 प्रतिशत पॉइंट तक बढ़ सकती है। इससे GDP ग्रोथ 0.2-0.3 प्रतिशत पॉइंट तक कम हो सकती है। Moody's का अनुमान है कि इस संकट से रुपया कमजोर होगा, महंगाई बढ़ेगी और भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) भी बढ़ेगा।

एक्सपर्ट की राय: बढ़ते खतरे

ऊर्जा के लिए मध्य पूर्व पर भारत की भारी निर्भरता इसे इस तरह के चोकपॉइंट (chokepoint) के डिस्टर्बेंस के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 45%, नेचुरल गैस का 60% और LPG का 90% से भी ज्यादा इसी क्षेत्र से इम्पोर्ट करता है। मध्य मार्च तक, हॉर्मुज संकट के कारण भारतीय जहाजों पर काफी मात्रा में कच्चा तेल, LPG और LNG फंसा हुआ था। अगर यह रुकावट लंबी खिंचती है, तो तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे गंभीर आर्थिक मुश्किलें और प्रोडक्शन रुक सकता है। इससे स्टैगफ्लेशन का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि ऊर्जा की बढ़ती लागत मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और फर्टिलाइजर की कीमतों को प्रभावित करती है। रूस या अमेरिका से वैकल्पिक रूट मौजूद हैं, लेकिन वे धीमे और महंगे हैं, जिससे तत्काल राहत मिलना मुश्किल है। भारत के कच्चे तेल के मौजूदा भंडार केवल अस्थायी सहारा दे सकते हैं।

बढ़ती लागत से मुनाफे पर दबाव

इनपुट कॉस्ट (input costs) में आई तेज बढ़ोतरी, जो अब 45 महीने के शिखर पर है, और आउटपुट प्राइस (output prices) में इजाफे से मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन (profit margins) सीधे तौर पर कम हो रहे हैं। यह महंगाई कई इंडस्ट्रीज को प्रभावित कर रही है, जैसे कि केमिकल्स और फर्टिलाइजर सेक्टर, जो बढ़ी हुई फीडस्टॉक कॉस्ट का सामना कर रहे हैं, और लॉजिस्टिक्स सेक्टर, जो डीजल की बढ़ी कीमतों से जूझ रहा है।

इंडस्ट्रियल आउटपुट में गिरावट का डर

हालांकि भारत की कुल GDP मजबूत बनी हुई है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दबाव के संकेत दिख रहे हैं। विश्लेषकों को मार्च के लिए भारत के इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) में मंदी की आशंका है। ICRA का अनुमान है कि मध्य पूर्व संकट के मैन्युफैक्चरिंग इनपुट्स पर पड़ने वाले असर के कारण IIP की ग्रोथ लगभग 3-4% रह सकती है।

आउटलुक और सरकारी कदम

भले ही IMF ने भारत की GDP ग्रोथ 7.3% रहने का अनुमान लगाया है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिम और इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन (imported inflation) का कॉम्बिनेशन एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। विश्लेषक स्टैगफ्लेशन के असली खतरे की चेतावनी दे रहे हैं। भारत के मैन्युफैक्चरिंग कैपिटल एक्सपेंडिचर (CAPEX) में 2025-26 में मजबूत ग्रोथ की उम्मीद है, जो 2026-27 में थोड़ी कम हो सकती है, जिससे बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच स्थिरीकरण की संभावना दिखती है। सरकार जरूरी कदम उठा रही है, जैसे नेचुरल गैस के डिस्ट्रीब्यूशन को मैनेज करने और ऊर्जा सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट (Essential Commodities Act) का उपयोग करना। हालांकि, लंबी अवधि के समाधानों में ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, घरेलू अन्वेषण बढ़ाना और रिन्यूएबल एनर्जी स्टोरेज को बूस्ट करना शामिल होगा।

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