टैक्स व्यवस्था में बड़ा फेरबदल
यह नई व्यवस्था फाइनेंस एक्ट 2024 के बाद लागू किए गए 'डीम्ड डिविडेंड' वाले टैक्स नियम को बदल देती है। उस व्यवस्था में, शेयरधारकों को बायबैक से मिली पूरी रकम पर, बिना खरीद की लागत (Cost of Acquisition) को घटाए, अपने स्लैब रेट के हिसाब से टैक्स देना पड़ता था। सरकार ने इस बार इस व्यवस्था को सुधारा है और बायबैक टैक्सेशन को शेयरों की सामान्य बिक्री (Normal Share Sale) के समान 'कैपिटल गेन' ढांचे में वापस लाया है। बजट 2026-27 में घोषित इस बदलाव से निवेशकों की टैक्स देनदारी को लेकर अनिश्चितता कम होगी।
निवेशकों और प्रमोटरों पर असर
इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा छोटे (Retail) और अल्पसंख्यक (Minority) निवेशकों को मिलेगा। अब वे अपनी शेयर खरीदने की लागत को घटाकर, केवल वास्तविक मुनाफे (Profit) पर ही टैक्स देंगे, जिससे उनकी कुल टैक्स देनदारी कम हो सकती है।
हालांकि, कंपनी के प्रमोटरों (Promoters) के लिए नियम थोड़े अलग हैं। उन्हें बायबैक से होने वाले कैपिटल गेन पर एक अतिरिक्त बायबैक टैक्स का सामना करना पड़ेगा। कॉर्पोरेट प्रमोटरों के लिए यह दर 22% और गैर-कॉर्पोरेट प्रमोटरों के लिए 30% तय की गई है। इस अंतर का मकसद प्रमोटरों द्वारा टैक्स आर्बिट्रेज (Tax Arbitrage) या टैक्स बचाने के लिए बायबैक का गलत इस्तेमाल रोकना है।
बाजार और विशेषज्ञों की राय
बाजार के जानकारों का मानना है कि यह कदम भारत की टैक्स व्यवस्था को सरल बनाने और बाजार की दक्षता (Market Efficiency) बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि प्रमोटरों पर बढ़ी हुई कर दरें कंपनियों को बायबैक के बजाय डिविडेंड (Dividend), कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) या रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) जैसी अन्य पूंजी आवंटन रणनीतियों पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।
अलवरेज एंड मार्सल इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और एम&ए टैक्स लीडर, विशाल हकाणी का कहना है कि भले ही प्रमोटरों को नई दरें 2024 से पहले के स्तर जितनी आकर्षक न लगें, लेकिन रिटेल और इंस्टीट्यूशनल निवेशकों के लिए टैक्स स्पष्टता और संभावित लाभ महत्वपूर्ण हैं। यह बदलाव उस पिछली चिंता को दूर करता है कि बायबैक से प्राप्त राशि पर प्रतिकूल तरीके से, यानी बिना लागत कटौती के, टैक्स लगाया जा रहा था।