India Customs Policy: सरकार का बड़ा कदम! सप्लाई चेन को बनाएंगे मज़बूत, लॉजिस्टिक्स लागत में आएगी कमी

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AuthorNeha Patil|Published at:
India Customs Policy: सरकार का बड़ा कदम! सप्लाई चेन को बनाएंगे मज़बूत, लॉजिस्टिक्स लागत में आएगी कमी

भारत सरकार कस्टम्स पॉलिसी में बड़ा बदलाव करने जा रही है। अब इसे सिर्फ रेवेन्यू (Revenue) वसूलने का जरिया नहीं, बल्कि आर्थिक मज़बूती और सप्लाई चेन (Supply Chain) को स्थिर बनाने के एक अहम टूल के तौर पर देखा जाएगा। ड्यूटी में छूट, एक्सपोर्ट (Export) को बढ़ावा और कार्गो क्लीयरेंस (Cargo Clearance) को आसान बनाकर लॉजिस्टिक्स की लागत कम की जाएगी, जिससे ग्लोबल अनिश्चितताओं और बढ़ती एनर्जी (Energy) कीमतों का सामना करने में मदद मिलेगी।

क्या हुआ है?

केंद्र सरकार ने कस्टम्स और ट्रेड (Trade) की रणनीति में एक बड़ा बदलाव लाया है। अब कस्टम्स को सिर्फ टैक्स (Tax) वसूलने का जरिया नहीं माना जाएगा, बल्कि इसका मुख्य फोकस डोमेस्टिक (Domestic) बिज़नेस के लिए सप्लाई चेन को स्थिर और लॉजिस्टिक्स की लागत को कम करना होगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब ग्लोबल भू-राजनीतिक तनावों से ट्रेड रूट्स, खासकर एनर्जी सप्लाई पर खतरा मंडरा रहा है। इस जोखिम को कम करने के लिए, एक इंटर-मिनिस्ट्रियल (Inter-ministerial) टास्क फोर्स (Task Force) का गठन किया गया है जो सप्लाई चेन की कमजोरियों पर नज़र रखेगी। साथ ही, पेट्रोकेमिकल्स (Petrochemicals) जैसे कुछ खास सेक्टर में ड्यूटी में बदलाव किए गए हैं ताकि स्थिरता बनी रहे।

लॉजिस्टिक्स लागत क्यों ज़रूरी है?

लॉजिस्टिक्स की ऊंची लागत भारतीय बिज़नेस के लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है। साल 2025 के NCAER रिपोर्ट के मुताबिक, यह लागत भारत के GDP का 7.97% है, जो लगभग ₹24 लाख करोड़ सालाना बैठती है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में इसमें सुधार हुआ है, फिर भी छोटे बिज़नेस (₹5 करोड़ से कम रेवेन्यू वाले) पर इसका बोझ ज़्यादा है। इन छोटे बिज़नेस की लॉजिस्टिक्स लागत उनके आउटपुट का 16.9% तक हो सकती है, जबकि बड़े बिज़नेस के लिए यह सिर्फ 7.6% है। रोड ट्रांसपोर्ट (Road Transport) की लागत का 42% फ्यूल (Fuel) पर खर्च होता है, इसलिए ग्लोबल एनर्जी की कोई भी अस्थिरता सीधे तौर पर देशभर की कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margin) को प्रभावित करती है।

बिज़नेस के लिए बड़े रणनीतिक बदलाव

इस पॉलिसी बदलाव में इम्पोर्ट (Import) और एक्सपोर्ट (Export) से जुड़ी कंपनियों के लिए कई व्यावहारिक उपाय शामिल हैं। सरकार ने RoDTEP (Remission of Duties and Taxes on Export Products) स्कीम को आगे बढ़ाया है और स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) यूनिट्स को डोमेस्टिक मार्केट में सामान बेचने के लिए ज़्यादा फ्लेक्सिबिलिटी (Flexibility) दी है। इसके अलावा, रुपए को सहारा देने और गैर-ज़रूरी खर्चों को हतोत्साहित करने के लिए सोना (Gold), चांदी (Silver) और प्लैटिनम (Platinum) जैसी कीमती धातुओं पर इम्पोर्ट ड्यूटी (Import Duty) बढ़ाई गई है।

कॉर्पोरेशन्स (Corporations) के लिए, बिज़नेस करने की लागत को कम करने पर नया फोकस है। कंपनियों को ड्यूटी लागत कम करने के लिए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) का इस्तेमाल करने और बॉन्डेड वेयरहाउसिंग (Bonded Warehousing) का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे उन्हें ड्यूटी पेमेंट (Duty Payment) में देरी करने और कैश फ्लो (Cash Flow) सुधारने में मदद मिलेगी। पोर्ट्स (Ports) पर पेनाल्टी (Penalty) और अनावश्यक देरी से बचने के लिए हार्मोनाइज्ड सिस्टम (HS) के तहत गुड्स (Goods) का सटीक क्लासिफिकेशन (Classification) भी ज़रूरी हो रहा है।

ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) और भविष्य के जोखिम

सरकार "ट्रस्टेड इम्पोर्टर" (Trusted Importer) फ्रेमवर्क भी ला रही है ताकि फिजिकल इंस्पेक्शन (Physical Inspection) कम करके कार्गो क्लीयरेंस (Cargo Clearance) को तेज़ किया जा सके। ऑटोमेशन (Automation) और पेपरलेस अप्रूवल (Paperless Approvals) के साथ मिलकर, इन उपायों से डिटेंशन (Detention) और डेमरेज (Demurrage) जैसे अतिरिक्त खर्चों में कमी आने की उम्मीद है, जो गुड्स के पोर्ट्स या वेयरहाउस में फंसे रहने पर लगते हैं।

हालांकि, चुनौतियां बनी हुई हैं। ये पॉलिसी बदलाव सपोर्ट तो देते हैं, लेकिन कंपनियों को अभी भी लास्ट-माइल कनेक्टिविटी (Last-mile Connectivity) और इनलैंड वॉटरवेज (Inland Waterways) जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) गैप्स से जोखिम का सामना करना पड़ेगा। निवेशकों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि केवल इन फायदों पर निर्भर रहने से ग्लोबल सप्लाई शॉक (Global Supply Shocks) या रॉ मटेरियल (Raw Material) की कीमतों में बड़े उतार-चढ़ाव का असर कम नहीं होगा। मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स (Multimodal Logistics) - यानी रोड ट्रांसपोर्ट के बजाय रेल और जलमार्गों का इस्तेमाल - एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहां कंपनियों को लंबे समय तक बचत देखने के लिए निवेश करना होगा।

निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

निवेशक इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि कस्टम्स सुधार ज़मीनी स्तर पर कितनी तेज़ी से लागू होते हैं। मुख्य बात यह होगी कि "ट्रस्टेड इम्पोर्टर" प्रोग्राम प्रमुख इम्पोर्ट-डिपेंडेंट (Import-dependent) कंपनियों के लिए क्लीयरेंस समय को प्रभावी ढंग से कम कर पाता है या नहीं। इसके अलावा, सेक्टर-स्पेसिफिक (Sector-specific) डिमांड और नए ड्यूटी स्ट्रक्चर्स (Duty Structures) का प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) पर पड़ने वाले असर को ट्रैक करना ज़रूरी होगा, खासकर उन इंडस्ट्रीज़ के लिए जो इम्पोर्ट लागत के प्रति संवेदनशील हैं, जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स (Electronics), केमिकल्स (Chemicals) और कंज्यूमर गुड्स (Consumer Goods)। ई-कॉमर्स (E-commerce) और रिटेल (Retail) सेक्टर की कंपनियों के लिए रिवर्स लॉजिस्टिक्स (Reverse Logistics) पर एक स्पष्ट पॉलिसी का विकास भी महत्वपूर्ण होगा।

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