भारत ने अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर प्रस्तावित **12.5%** अतिरिक्त टैरिफ को जोरदार झटका दिया है। नई दिल्ली का कहना है कि इस टैरिफ के लिए कोई कानूनी आधार या सबूत नहीं है और यह व्यापार को नुकसान पहुंचा सकता है।
अमेरिकी टैरिफ प्रस्ताव पर भारत का कड़ा विरोध
अमेरिकी सरकार के प्रस्ताव को भारत ने सीधे तौर पर खारिज कर दिया है। यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) ने जिन भारतीय उत्पादों पर 12.5% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया था, उसे नई दिल्ली ने नौ पन्नों के एक विस्तृत सबमिशन में चुनौती दी है। भारत सरकार का तर्क है कि सप्लाई चेन में जबरन श्रम (forced labor) की चिंताओं के आधार पर लगाए जा रहे इन टैरिफ के लिए आवश्यक कानूनी आधार और विशिष्ट देश-स्तरीय सबूत नहीं हैं।
भारतीय उद्योगों पर पड़ेगा भारी असर
इस प्रस्तावित टैरिफ से अमेरिका पर निर्भर भारतीय कंपनियों में हड़कंप मच गया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries), आलोक इंडस्ट्रीज (Alok Industries) और शाही एक्सपोर्ट्स (Shahi Exports) जैसी बड़ी कंपनियों ने इसके खिलाफ याचिका दायर की है। साथ ही, कई सोलर उपकरण निर्माता भी इस सूची में शामिल हैं। इन कंपनियों को डर है कि अतिरिक्त लागत के कारण भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में कम प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे और सप्लाई चेन बाधित हो सकती है।
छोटे निर्यातकों की भी चिंता बढ़ी है। गुजरात के निर्जलित प्याज और लहसुन के निर्यातक, जैसे पार्थ फूड्स (Parth Foods) और हनुमान फूड्स (Hanumant Foods), का कहना है कि इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए खाद्य उत्पादों की कीमतें बढ़ेंगी। उनका मानना है कि यह टैरिफ, श्रम प्रथाओं के बजाय एक संरक्षणवादी (protectionist) कदम ज्यादा है।
सबूतों और कानूनी दांव-पेंच का खेल
भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने साफ कहा है कि USTR अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301(d) के तहत कानूनी मानकों को पूरा करने में विफल रहा है। भारतीय सबमिशन में यह भी कहा गया है कि अमेरिका ने ऐसे कोई अर्थव्यवस्था-विशिष्ट सबूत पेश नहीं किए हैं जिनसे यह साबित हो कि भारत में जबरन श्रम आयात प्रतिबंध की कमी से अमेरिकी वाणिज्य को नुकसान पहुंच रहा है या बाजार की स्थिति बिगड़ रही है।
सबूत के तौर पर, सरकार ने व्यापार डेटा का हवाला दिया है। तंबाकू और कपास जैसे क्षेत्रों में, भारतीय आयात या तो बढ़ा है या ऐसे बदला है जिससे अमेरिकी उद्योग को नुकसान नहीं हुआ। उदाहरण के लिए, भारत से अमेरिकी तंबाकू का आयात $225,000 से बढ़कर $3.5 मिलियन हो गया, जिसका अमेरिकी कंपनियों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। इसी तरह, कपास के आयात में, चीन से आयात घटने के बाद भारतीय सामानों ने बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाई है, जो दर्शाता है कि भारत का निर्यात प्रदर्शन अनुचित श्रम प्रथाओं के बजाय प्रतिस्पर्धात्मकता पर आधारित है।
निर्यातकों के लिए आगे क्या?
फिलहाल, यह मामला बातचीत के दौर में है। अमेरिकी सरकार ने अभी तक इन टैरिफ को लागू करने पर अंतिम फैसला नहीं लिया है। निवेशकों और व्यवसायों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिकी प्रशासन भारतीय मंत्रालय द्वारा पेश किए गए सबूतों को स्वीकार करता है या टैरिफ लागू करता है। टेक्सटाइल, सोलर और प्रोसेस्ड फूड जैसे क्षेत्रों के लिए इस सुनवाई का नतीजा बेहद अहम होगा, क्योंकि 12.5% अतिरिक्त लागत लाभ मार्जिन को कम कर सकती है या कंपनियों को कीमतें बढ़ाने पर मजबूर कर सकती है, जिससे निर्यात की मात्रा प्रभावित हो सकती है।
