1 अक्टूबर, 2025 को भारत और नॉर्वे के बीच एक ऐतिहासिक ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को औपचारिक रूप दिया गया, और इसी के साथ इंडिया-ईएफटीए ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) भी लागू हो गया। इस महत्वपूर्ण समझौते के तहत, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन जैसे ईएफटीए देशों ने अगले 15 सालों में भारत में $100 अरब (लगभग ₹8.3 लाख करोड़) के विदेशी निवेश (FDI) का एक बड़ा वादा किया है। इसका लक्ष्य भारत के मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और रिसर्च सेक्टर को नई ऊंचाई देना है, जिसके साथ 10 लाख (1 मिलियन) प्रत्यक्ष रोजगार पैदा करने की महत्वाकांक्षी योजना भी शामिल है।
हालांकि, इस बड़े वादे की असलियत पर अब सवाल उठने लगे हैं। कई रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है कि यह FDI निवेश का वादा बातचीत के दौरान आखिरी समय में जोड़ा गया था और इसमें निवेश सुनिश्चित करने के लिए मजबूत प्रवर्तन (enforcement) तंत्र का अभाव है। स्विस अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि ऐसे निवेश पूरी तरह से प्राइवेट सेक्टर की पहलों पर निर्भर करते हैं। हकीकत यह है कि साल 2000 से अब तक ईएफटीए देशों से भारत में कुल FDI $11 अरब से भी कम रहा है, जो $100 अरब के लक्ष्य से मीलों दूर है।
इस बीच, दुनिया के सबसे बड़े सॉवरेन वेल्थ फंड, Norges Bank, जो भारत में एक बड़ा निवेशक है, ने हाल ही में अपने निवेश पोर्टफोलियो में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। 31 दिसंबर, 2025 तक, Norges Bank ने भारत में अपने आवंटन को 40 बेसिस पॉइंट घटाकर 2.1% कर दिया। यह कदम 2025 में भारत से मिले -1.4% के नकारात्मक रिटर्न और तुलनात्मक रूप से कमजोर प्रदर्शन के बाद उठाया गया है। हालांकि, साल के अंत तक फंड के भारत पोर्टफोलियो का कुल मूल्य $31.4 अरब था।
यह ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप दोनों देशों के बीच क्लीन एनर्जी, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल हेल्थ, स्पेस को-ऑपरेशन और ब्लू इकोनॉमी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करेगी। भारत का डिजिटल हेल्थ मार्केट, जो 2025 में लगभग $19.15 अरब का था, 2034 तक $84 अरब से अधिक होने का अनुमान है। यह वृद्धि बढ़ती इंटरनेट पहुंच और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के तेजी से अपनाए जाने से प्रेरित है। वहीं, क्लीन एनर्जी में वैश्विक निवेश $2.2 ट्रिलियन तक पहुँच चुका है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी का प्रदर्शन मजबूत रहा है।
TEPA के तहत $100 अरब के FDI और 10 लाख (1 मिलियन) नौकरियों का लक्ष्य, इनकी हकीकत में तब्दील होने की क्षमता को लेकर बड़ा संदेह पैदा कर रहा है। विश्लेषण बताते हैं कि ये आंकड़े 'एस्पिरेशनल' (aspirational) हैं, न कि 'बाइंडिंग' (binding), क्योंकि इनमें ठोस प्रवर्तन उपायों की कमी है और ये बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र की पहलों पर निर्भर करते हैं। Norges Bank जैसे बड़े निवेशक का भारत से अपना आवंटन कम करना यह दर्शाता है कि वास्तविक बाजार प्रदर्शन और सापेक्ष मूल्यांकन, द्विपक्षीय समझौतों के दीर्घकालिक लक्ष्यों पर हावी हो सकते हैं। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी होंगी कि कूटनीतिक वादों के मुकाबले वास्तविक आर्थिक परिणाम कितने दिखते हैं।