FY26 में भारत का नेट FDI घटा, पर ग्रास इनफ्लो ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

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AuthorAditya Rao|Published at:
FY26 में भारत का नेट FDI घटा, पर ग्रास इनफ्लो ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

आर्थिक वर्ष 2026 में भारत के लिए विदेशी निवेश का मिला-जुला तस्वीर देखने को मिली। एक ओर जहां देश में ग्रास फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) का रिकॉर्ड **$94.84 अरब** रहा, वहीं नेट FDI घटकर सिर्फ **$6.95 अरब** रह गया। यह गिरावट मुख्य रूप से विदेशी निवेशकों द्वारा कमाई गई रकम की स्वदेश वापसी और भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में बढ़ाए गए निवेश के कारण हुई है।

Detailed Coverage

नेट FDI घटने की वजहें:

वित्त राज्य मंत्री, पंकज चौधरी द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, नेट FDI में यह कमी दो मुख्य कारणों से आई है। पहला, विदेशी कंपनियों द्वारा मुनाफे की स्वदेश वापसी (Repatriation) बढ़ी है, जिसे सरकार भारतीय बाजार में निवेश पर मजबूत रिटर्न का संकेत मान रही है। दूसरा, 2022 में विदेशी निवेश के नियमों को आसान बनाने के बाद से भारतीय कंपनियों ने अपने वैश्विक परिचालन को बढ़ाने में आक्रामक रुख अपनाया है।

हालांकि, यह आउटफ्लो (बाहर जाने वाला पैसा) फिलहाल नेट FDI के आंकड़ों को प्रभावित कर रहा है, लेकिन सरकार इसे भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की एक रणनीतिक चाल के तौर पर देख रही है। बता दें कि FY24 में नेट FDI $10.13 अरब और FY25 में $960 मिलियन दर्ज किया गया था, जो FY23 के $27.99 अरब से काफी कम है।

महंगाई पर लगाम और ग्राहकों को राहत:

निवेश के आंकड़ों के साथ-साथ, सरकार ने घरेलू महंगाई को नियंत्रित करने और आम आदमी की क्रय शक्ति को बनाए रखने के लिए अपनी रणनीति भी बताई है। इसमें आवश्यक वस्तुओं के बफर स्टॉक का प्रबंधन, रणनीतिक ओपन मार्केट सेल और आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए खाद्य पदार्थों का लक्षित आयात शामिल है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत करीब 81 करोड़ लाभार्थियों को अनाज का वितरण जारी है। इसके अलावा, व्यक्तिगत आयकर स्लैब में संशोधन और रोजमर्रा की उपभोग की वस्तुओं पर वस्तु एवं सेवा कर (GST) दरों को तर्कसंगत बनाने जैसे कदम मध्यम वर्ग के डिस्पोजेबल आय को सहारा देने के लिए उठाए गए हैं।

रुपये की चाल और बाज़ार की स्थिति:

भारतीय रुपये (INR) का अमेरिकी डॉलर के मुकाबले प्रदर्शन भी आर्थिक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण संकेतांक है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मई 2014 में औसत ₹59.3 के मुकाबले मई 2026 में यह ₹95.6 पर पहुंच गया। 22 जुलाई 2026 तक, विनिमय दर ₹96.57 प्रति अमेरिकी डॉलर दर्ज की गई। सरकार का कहना है कि मुद्रा का मूल्य काफी हद तक बाजार द्वारा निर्धारित होता है, और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) केवल अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करता है। निवेशक आने वाले बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BOP) के आंकड़ों और भविष्य के विदेशी निवेश (ODI) के रुझानों पर नजर रखेंगे ताकि यह समझा जा सके कि रिकॉर्ड ग्रास इनफ्लो और बढ़ते आउटवर्ड निवेश का संयोजन भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को कैसे प्रभावित करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.