लगातार हो रही फ्यूल प्राइस एडजस्टमेंट्स (fuel price adjustments) से देश की इकोनॉमी (economy) पर बड़ा असर पड़ रहा है। इससे न केवल महंगाई बढ़ रही है, बल्कि आम आदमी की खर्च करने की क्षमता (spending power) भी कम हो रही है।
आम आदमी पर महंगाई का बोझ
पूरे भारत में फ्यूल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। राजधानी दिल्ली में पेट्रोल अब ₹98.64 प्रति लीटर हो गया है, जबकि मुंबई में यह ₹107.59 पर पहुंच गया है। डीजल की बात करें तो दिल्ली में यह ₹91.58 और मुंबई में ₹94.08 प्रति लीटर तक बिक रहा है। कोलकाता में पेट्रोल ₹109.70 और चेन्नई में ₹104.49 प्रति लीटर के स्तर पर है। यह लगातार दूसरे हफ्ते हुई बढ़ोतरी है।
फ्यूल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
इस बार की बढ़ोतरी के पीछे कई वजहें हैं। मई 2026 की शुरुआत में इंटरनेशनल क्रूड ऑयल (crude oil) की कीमतों में लगातार उछाल देखा गया है। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) $100 से $112 प्रति बैरल के बीच बना हुआ है, जिसकी वजह पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से सप्लाई में रुकावटें हैं।
इन वैश्विक उठा-पटक को रुपए के कमजोर होने से और हवा मिल रही है। रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर करीब ₹95.77-₹96.19 के स्तर पर आ गया है, जिससे डॉलर में तेल खरीदना महंगा हो गया है। घरेलू टैक्स (domestic taxation) भी एक बड़ा फैक्टर हैं, जिसमें एक्साइज ड्यूटी (excise duty) और वैट (VAT) खुद रिटेल प्राइस का करीब 50-55% तक बैठते हैं। सरकार ने हाल ही में पेट्रोल एक्सपोर्ट (petrol exports) पर ₹3 प्रति लीटर का स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) भी लगाया है, ताकि बढ़ी कीमतों का फायदा उठाया जा सके।
महंगाई का चक्रव्यूह और इकोनॉमी पर असर
फ्यूल प्राइसेस में लगातार बढ़ोतरी से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के महंगाई लक्ष्य (inflation targets) पर खतरा मंडराने लगा है। अप्रैल 2026 में होलसेल इन्फ्लेशन (wholesale inflation) 8.3% के 3.5 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जिसका मुख्य कारण फ्यूल और एनर्जी की कीमतें हैं। वहीं, कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (consumer price inflation) में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा (Sanjay Malhotra) ने चेतावनी दी है कि लगातार भू-राजनीतिक तनाव की वजह से सरकार को कीमतों में बढ़ोतरी आम आदमी तक पहुंचानी पड़ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सप्लाई शॉक (supply shocks) बड़े पैमाने पर होते हैं तो RBI दखल देगा, जिससे मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) टाइट हो सकती है।
इस लगातार महंगाई का असर कंज्यूमर स्पेंडिंग (consumer spending) पर पड़ने की आशंका है। शहरी उपभोक्ता पहले से ही अपने बजट को कसने, गैर-जरूरी खर्चों को टालने और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (electric vehicles) पर विचार करने की योजना बना रहे हैं। भारत की इकोनॉमी, जो आयात पर बहुत अधिक निर्भर करती है, तेल की कीमतों के झटके के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। यह उम्मीद जताई जा रही है कि बढ़ते इनपुट कॉस्ट (input costs) और कम होती कंज्यूमर परचेजिंग पावर (consumer purchasing power) की वजह से GDP ग्रोथ (GDP growth) में भी गिरावट आ सकती है।
आगे क्या? अनिश्चितता बनी रहेगी
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, होर्मुज जलडमरूमध्य में सप्लाई की रुकावटों और वैश्विक तेल बाजार की गतिशीलता को देखते हुए, क्रूड ऑयल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव की उम्मीद है। एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें $100 और $125 प्रति बैरल के बीच बनी रह सकती हैं, जो कूटनीतिक प्रगति (diplomatic progress) और सप्लाई में रुकावट की अवधि पर निर्भर करेगा। भारत के लिए, इसका मतलब है कि महंगाई और कंज्यूमर बजट पर दबाव जारी रहेगा। RBI, ग्रोथ-इन्फ्लेशन के आउटलुक (outlook) और इन प्राइस इनक्रीज (price increases) के व्यापक इकोनॉमी पर पड़ने वाले दूसरे दर्जे के असर (second-round effects) पर बारीकी से नजर रखेगा। सरकार को फ्यूल टैक्स से रेवेन्यू (revenue) बढ़ाने और महंगाई को नियंत्रित करने के बीच संतुलन बनाना होगा, जिसके लिए आने वाले महीनों में और पॉलिसी एडजस्टमेंट्स (policy adjustments) की जरूरत पड़ सकती है।