कलेक्शन में कमी की क्या है वजह?
आंकड़े बताते हैं कि कुल डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में 5.12% की साल-दर-साल बढ़ोतरी हुई, जो ₹23.40 लाख करोड़ रहा। यह सरकार के रिवाइज्ड अनुमान ₹24.21 लाख करोड़ से ₹81,000 करोड़ कम है। ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन ₹28.12 लाख करोड़ रहा, जिसमें 4.03% की बढ़ोतरी हुई। अच्छी बात यह है कि रिफंड (Refund) में 1.09% की मामूली कमी आई, जिससे नेट कलेक्शन को सहारा मिला, जो ₹4.71 लाख करोड़ रहा।
कॉर्पोरेट टैक्स ने संभाला मोर्चा
इस कलेक्शन में सबसे बड़ा योगदान कॉर्पोरेट टैक्स (Corporate Tax) का रहा। FY26 में यह ₹13.81 लाख करोड़ रहा, जो पिछले साल FY25 के ₹12.72 लाख करोड़ से काफी ज्यादा है। यह कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) और कंप्लायंस (Compliance) में सुधार का संकेत देता है।
पर्सनल इनकम टैक्स की धीमी रफ्तार
लेकिन, दूसरी तरफ पर्सनल इनकम टैक्स (Personal Income Tax) और अन्य नॉन-कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन लगभग स्थिर रहा। FY26 में यह ₹13.72 लाख करोड़ रहा, जो FY25 के ₹13.73 लाख करोड़ से थोड़ा कम है। यह दिखाता है कि आम आदमी की आय में उम्मीद के मुताबिक बढ़ोतरी नहीं हुई है, जो इकोनॉमी की रिकवरी में असमानता का संकेत देता है।
STT और मार्केट का हाल
सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) से भी सरकार को ₹57,522 करोड़ मिले, जो FY25 के ₹53,296 करोड़ से ज्यादा है। शेयर बाजार में बढ़ी ट्रेडिंग वॉल्यूम (Trading Volume) और रिटेल निवेशकों की भागीदारी के कारण यह संभव हुआ। हालांकि, सरकार ने बजट 2026 के तहत डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग (Derivatives Trading) पर STT की दरें बढ़ाई हैं, जो भविष्य में मार्केट की एक्टिविटी को प्रभावित कर सकती है।
फिस्कल डेफिसिट और इकोनॉमिक ग्रोथ
सरकार ने FY27 के लिए 4.3% जीडीपी (GDP) का फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) लक्ष्य रखा है, जो FY26 के रिवाइज्ड 4.4% से कम है। भारत की इकोनॉमी के FY27 में 6.1% से 7.2% की दर से बढ़ने का अनुमान है। इस बीच, FY26 में शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखी गई, जहां सेंसेक्स (Sensex) 7.06% और निफ्टी (Nifty) 5.05% टूटा, जिससे निवेशकों की संपत्ति में ₹51 लाख करोड़ की कमी आई।
आगे क्या?
पर्सनल इनकम टैक्स कलेक्शन में कमजोरी इकोनॉमिक रिकवरी की गति और स्थिरता पर सवाल खड़े करती है। यह कमजोरियां टैक्स रिलीफ मेजर्स (Tax Relief Measures) से भी जुड़ी हो सकती हैं। जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tension) जैसे वेस्ट एशिया संकट का भी असर कमोडिटी कीमतों, महंगाई और ग्लोबल ट्रेड पर पड़ सकता है, जो टैक्स रेवेन्यू के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार को कर्ज-से-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP Ratio) को कंट्रोल में रखने के लिए इकोनॉमी की ग्रोथ को और तेज करने की जरूरत है, ताकि व्यापक आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित हो सके।
