एक्सपोर्ट-इंपोर्ट पर अब होगी रोज कड़ी निगरानी!
ग्लोबल सप्लाई चेन में छाई अनिश्चितता और शिपिंग की बढ़ती लागतों के बीच, भारतीय निर्यातकों को राहत देने के लिए सरकार पूरी तरह तैयार है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने एक ऐसी साप्ताहिक प्रणाली (Weekly Monitoring System) तैयार की है, जो एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के फ्लो पर लगातार नजर रखेगी। इसका सीधा फायदा यह होगा कि किसी भी सेक्टर में दिक्कत आने पर सरकार तुरंत एक्शन ले सकेगी, बजाय इसके कि समस्या गंभीर हो जाए।
निर्यातकों की बढ़ती चिंताएं, लागतों का भारी बोझ
मार्च की 9 तारीख को हुई बैठकों में निर्यातकों ने अपनी चिंताओं को खुलकर सामने रखा। उन्होंने बताया कि पैकिंग मैटेरियल की लागत आसमान छू रही है और अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं, खासकर पश्चिम एशिया (West Asia) के साथ व्यापार में। ग्लोबल घटनाओं की वजह से पॉलीमर और रेजिन जैसे जरूरी पेट्रोकेमिकल्स (Petrochemicals) की सप्लाई और कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका है, जिससे पैकिंग और महंगी हो सकती है। छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए इन बढ़ती लागतों को झेलना बेहद मुश्किल हो रहा है, क्योंकि उनके पास इन झटकों को झेलने की क्षमता कम होती है।
प्रमुख सेक्टरों पर दबाव, सरकारी मदद की दरकार
परिधान (Apparel), चमड़ा (Leather), टेलीकॉम और चिकित्सा उपकरण (Medical Devices) जैसे सेक्टर सप्लाई चेन की बाधाओं, लॉजिस्टिक्स (Logistics) की दिक्कतों और बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं। कारोबारियों ने सरकार से LNG, हीलियम और पेट्रोकेमिकल्स जैसे महत्वपूर्ण मैटेरियल की स्थिर सप्लाई सुनिश्चित करने की गुहार लगाई है। इसके अलावा, कंपनियों ने कैश फ्लो (Cash Flow) को बेहतर बनाने के लिए तुरंत गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) रिफंड (Refund) जारी करने की मांग पर भी जोर दिया है। पश्चिम एशिया की ओर शिपिंग में हो रही देरी भी सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा रही है।
पोर्ट्स पर कार्यक्षमता बढ़ाने के निर्देश
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल (Rajesh Agrawal) ने कहा कि जरूरी पैकिंग मैटेरियल की मांग, घरेलू उत्पादन और आयात की जरूरतों का तुरंत आकलन किया जाना चाहिए। इस पर अमल करते हुए, मंत्रालय ने बंदरगाहों, नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय (Ministry of Ports, Shipping and Waterways) को निर्देश दिए हैं कि वे पोर्ट्स और टर्मिनल्स पर पारदर्शिता और कार्यक्षमता (Efficiency) बढ़ाएं। पोर्ट फी (Port Fees) की जानकारी सार्वजनिक की जाएगी, बंकर फ्यूल (Bunker Fuel) की सप्लाई जांची जाएगी और देरी से अटके कंटेनरों (Containers) को जल्द हटाने का काम तेज किया जाएगा, ताकि लॉजिस्टिक्स की समस्या कम हो सके।
पश्चिम एशिया संघर्ष का बड़ा असर
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ रहा है, खासकर खाड़ी देशों (Gulf) को माल भेजने वालों पर। 2024-25 में भारत का इस क्षेत्र के साथ कुल व्यापार $178 अरब का था, जिसमें $56.87 अरब का निर्यात और $121.67 अरब का आयात शामिल था। इस महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग में आई रुकावटों से शिपिंग की लागत बढ़ गई है और डिलीवरी का समय लंबा हो गया है, जिससे भारतीय निर्यातकों की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) पर असर पड़ सकता है।
आगे की राह: निर्यातकों के लिए जोखिम बना रहेगा?
जहां सरकार की यह नई निगरानी प्रणाली समस्याओं को स्वीकार करती है, वहीं लागतों में बढ़ोतरी और कमजोर सप्लाई चेन के मूल कारणों को हल करने को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। पेट्रोकेमिकल्स, LNG और हीलियम के लिए आयात पर भारत की निर्भरता, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को ग्लोबल सप्लाई शॉक के प्रति संवेदनशील बनाती है। MSMEs को विशेष रूप से लगातार उच्च इनपुट कीमतों और अनिश्चित लॉजिस्टिक्स से जूझना पड़ सकता है, जिसका असर उत्पादन और रोजगार पर पड़ सकता है। GST रिफंड के लिए बार-बार की जा रही मांग तरलता (Liquidity) प्रबंधन की लगातार चुनौतियों को दर्शाती है। यदि भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) जारी रहता है, तो ग्लोबल शिपिंग और कच्चे माल की लागत में लगातार वृद्धि भारतीय निर्यातकों के प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) को प्रभावित कर सकती है।