वैश्विक उथल-पुथल के बीच बाज़ार में भारी बिकवाली
शुक्रवार, 27 मार्च 2026 को, मध्य पूर्व में अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव और वैश्विक बाज़ार में कमजोरी के संकेतों के चलते भारतीय शेयर बाज़ार में भारी बिकवाली देखी गई। बेंचमार्क Sensex 1.62% की बड़ी गिरावट के साथ 74,055.73 पर बंद हुआ, वहीं Nifty 50 भी 1.72% लुढ़ककर 23,306.45 पर आ गया। इस गिरावट ने पिछले दो दिनों की रिकवरी पर पानी फेर दिया। इस साल अब तक Nifty में करीब 12% की गिरावट आ चुकी है, जो बाज़ार की जबरदस्त अस्थिरता को दर्शाता है।
रुपया रिकॉर्ड स्तर पर कमजोर, बॉन्ड यील्ड में उछाल
बाज़ार पर बढ़ते दबाव के बीच, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.6470 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। इसके साथ ही, 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) भी बढ़कर 6.92% हो गई। ये संकेत बताते हैं कि बाज़ार भारी दबाव में है और बाहरी झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है।
तेल का संकट और स्टैगफ्लेशन का बढ़ता खतरा
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों का $100 प्रति बैरल के ऊपर बने रहना, भारत की अंदरूनी आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ा रहा है। यह एनर्जी प्राइस शॉक भारत की एक पुरानी संरचनात्मक समस्या - सप्लाई-साइड इन्फ्लेशन (Supply-side Inflation) के प्रति भेद्यता - को और गहरा कर रहा है। मांग-संचालित महंगाई के विपरीत, सप्लाई-साइड दबाव (जैसे सप्लाई चेन में रुकावटें और कमोडिटी की कीमतों में उछाल) बिना मांग बढ़े लागत बढ़ाते हैं, जिससे नीति निर्माताओं के लिए मुश्किल स्थिति पैदा होती है। हाल ही में CPI बास्केट में एनर्जी (ऊर्जा) का वेटेज बढ़ने से, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का महंगाई पर असर और बढ़ गया है। अनुमान है कि कच्चे तेल में हर $10 का इजाफा CPI में 0.5% से 1% तक की बढ़ोतरी कर सकता है। इसका मतलब है कि तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी सीधे तौर पर घरेलू महंगाई को बढ़ाएगी, जिससे एक 'स्टैगफ्लेशनरी स्पाइरल' (Stagflationary Spiral) पैदा हो सकता है, जहाँ बढ़ती कीमतों के बीच आर्थिक विकास (Growth) धीमा पड़ जाए।
विकास अनुमानों पर संकट के बादल
वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के लगातार बिगड़ते जाने के कारण फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY27) के लिए भारत के विकास अनुमानों (Growth Forecasts) पर भी सवाल उठ रहे हैं। Goldman Sachs ने तेल के झटके के भारत के निर्यात (Exports), ऊर्जा आयात (Energy Imports) और रेमिटेंस (Remittances) पर पड़ने वाले असर को देखते हुए FY27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 5.9% कर दिया है, जो S&P Global के 7.1% जैसे पिछले अनुमानों से काफी अलग है। FY27 के लिए महंगाई (Inflation) का अनुमान 4.3% (Crisil, S&P) से 4.6% (Goldman Sachs) तक लगाया जा रहा है। यह आर्थिक विकास में नरमी और महंगाई में बढ़ोतरी का मिश्रण भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए एक मुश्किल चुनौती पेश करता है, जिसे कीमतों पर काबू पाने और आर्थिक गतिविधि को समर्थन देने के बीच संतुलन साधना होगा।
रुपये में गिरावट और विदेशी मुद्रा भंडार पर सवाल
पिछले एक साल में 10.5% से ज्यादा गिरकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँचे भारतीय रुपये का यह अवमूल्यन (Depreciation) वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचाव (Risk Aversion) और विदेशी पूंजी के बहिर्वाह (Capital Outflows) का सीधा नतीजा है। RBI ने इस पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप किया है, अक्टूबर 2024 से अब तक करीब $94 बिलियन विदेशी मुद्रा बेची है। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) भले ही करीब $710 बिलियन पर मजबूत दिख रहे हों, लेकिन करीब से देखने पर कुछ कमजोरियां भी नज़र आती हैं। नेट फॉरवर्ड बिक्री (Net Forward Sales) ने प्रभावी भंडार को कम कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि आयात कवर (Import Cover) के रूप में मापी जाने वाली पर्याप्तता 2013 के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) तनाव के स्तर के करीब पहुँच रही है।
बाज़ार के लिए चुनौतियां और भविष्य का रास्ता
भारत का 85-90% आयातित ऊर्जा पर निर्भर होना, लंबे समय तक तेल की कीमतों में उछाल के प्रति इसे अत्यधिक संवेदनशील बनाता है, जिसका सीधा असर आयात बिल, चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ता है। चालू खाता घाटा बढ़ रहा है, जिसके बारे में Goldman Sachs का अनुमान है कि यह 2025 के स्तर से तीन गुना हो सकता है। RBI के सामने एक मुश्किल विकल्प है: महंगाई से लड़ने के लिए आक्रामक दर वृद्धि (Rate Hikes) से विकास को झटका लग सकता है, जबकि दरों को स्थिर रखने या कम करने से महंगाई और रुपये में गिरावट का खतरा बढ़ सकता है। Goldman Sachs जैसी संस्थाओं द्वारा की गई रेटिंग में कटौती सहित विश्लेषकों की राय, एक सतर्क दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर देती है। भारतीय बाज़ारों के लिए आगे का रास्ता अभी भी अनिश्चित और अस्थिर बना हुआ है।