पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और भारतीय रुपये में आई भारी कमजोरी ने 27 मार्च को शेयर बाजार में हाहाकार मचा दिया। निवेशकों की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं और बिकवाली का भारी दबाव देखने को मिला। सेंसेक्स 1,000 अंकों से ज्यादा की गिरावट के साथ 74,300 के स्तर के नीचे आ गया, वहीं निफ्टी भी 1.4% से ज्यादा लुढ़ककर 23,000 के अहम स्तर को पार कर गया।
रुपया हुआ कमजोर, बढ़ी महंगाई की चिंता
भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एक नए निचले स्तर ₹94.15 पर पहुँच गया। ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत के लिए यह और भी चिंताजनक है, क्योंकि पश्चिमी देशों में बढ़ती ऊर्जा कीमतें आयातित महंगाई (imported inflation) के डर को बढ़ा रही हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं, ऐसे में भू-राजनीतिक अस्थिरता और रुपये की गिरावट मिलकर बड़े मैक्रो इकोनॉमिक रिस्क पैदा कर रहे हैं। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है, सरकारी खजाने पर दबाव आ सकता है और महंगाई बढ़ सकती है। यह स्थिति भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश को कम कर देगी। बाजार की घबराहट का पैमाना, इंडिया VIX, 9% के पार चला गया, जो निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाता है।
गोल्डमैन सैक्स ने घटाई भारत की रेटिंग
इस बिगड़ती आर्थिक तस्वीर को देखते हुए ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भारतीय इक्विटी पर अपनी रेटिंग को 'ओवरवेट' (Overweight) से घटाकर 'मार्केट-वेट' (Market-weight) कर दिया है। फर्म ने निफ्टी 50 के लिए 12 महीने का टारगेट प्राइस 29,300 से घटाकर 25,900 कर दिया है। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि 2026 तक भारत की जीडीपी ग्रोथ घटकर 5.9% रह सकती है और महंगाई बढ़ सकती है। साथ ही, करंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी का 2% रहने का अनुमान है। ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि आने वाले समय में कंपनियों के मुनाफे (earnings) का माहौल चुनौतीपूर्ण रहेगा, इसलिए 2026 और 2027 के लिए इंडिया इंक (India Inc.) के अर्निंग ग्रोथ के अनुमान को घटाकर क्रमशः 8% और 13% कर दिया है।
वैल्यूएशन और FIIs का रुख
फिलहाल निफ्टी 20.4 के प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) मल्टीपल पर ट्रेड कर रहा है, जो इसके 10 साल के औसत 22.4 से कम है। हालांकि, गोल्डमैन सैक्स के नए टारगेट के अनुसार, यह 19.5x के फेयर-वैल्यू P/E का संकेत देता है। इसका मतलब है कि वर्तमान शेयर की कीमतें अभी भी जोखिम भरी हो सकती हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने मार्च महीने में जमकर बिकवाली की है, जो अक्टूबर 2024 के बाद सबसे तेज मासिक निकासी है। इससे निवेशकों के सेंटीमेंट में बदलाव का साफ संकेत मिलता है।
IT सेक्टर में दिखी कुछ मजबूती
बाजार में व्यापक बिकवाली देखने को मिली, जिसमें फाइनेंशियल, एफएमसीजी (FMCG) और ऑटो सेक्टर प्रभावित हुए। हालांकि, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) सेक्टर कुछ हद तक टिकाऊ नजर आया। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) और इंफोसिस जैसी कंपनियां लगभग 17-18x के P/E पर ट्रेड कर रही हैं, जो उनके ऐतिहासिक औसत से काफी कम है और साइक्लिकल सेक्टरों की तुलना में आकर्षक लग रहा है।
महंगाई का खतरा और बाजार का आउटलुक
तत्काल जोखिमों में ऊर्जा संकट का बने रहना शामिल है, जो महंगाई के चक्र (inflationary cycle) को ट्रिगर कर सकता है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर महंगाई को बढ़ाएंगी। इससे RBI को उम्मीद से पहले ब्याज दर में कटौती में देरी करनी पड़ सकती है, जिससे वित्तीय स्थितियां और सख्त हो जाएंगी। यह महंगाई का दबाव, कमजोर होते रुपये के साथ मिलकर, खासकर ऊर्जा-गहन कंपनियों और तेल डेरिवेटिव का उपयोग करने वालों के लिए कॉर्पोरेट प्रॉफिट मार्जिन को काफी निचोड़ सकता है। इसके अलावा, FIIs की लगातार बिकवाली सुरक्षा की तलाश (flight to safety) को दर्शाती है। यह ट्रेंड ऐतिहासिक रूप से उच्च भू-राजनीतिक अनिश्चितता और आर्थिक अस्थिरता के दौरान बढ़ता है, जो घरेलू लिक्विडिटी और बाजार के मूल्यों को कम करता है। इंडिया VIX का 27 के करीब का स्तर यह स्पष्ट करता है कि ट्रेडरों को आने वाले समय में काफी उतार-चढ़ाव की उम्मीद है।
बाजार की दिशा आने वाले समय में पश्चिम एशिया संघर्ष की अवधि और गंभीरता पर बहुत हद तक निर्भर करेगी। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स (Geojit Investments) के विश्लेषकों का सुझाव है कि बाजार की प्रतिक्रियाएं संभवतः असंगत होंगी, जो विकसित हो रही खबरों के साथ बदलती रहेंगी। वर्तमान माहौल में उच्च अस्थिरता, कमजोर मुद्रा और कॉर्पोरेट मुनाफे और आर्थिक स्थिरता पर महत्वपूर्ण दबाव है। निवेशक कच्चे तेल की कीमतों, मुद्रा के उतार-चढ़ाव और विदेशी पूंजी प्रवाह पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।