यह ₹1.18 लाख करोड़ का आउटफ्लो फरवरी के ₹22,615 करोड़ के इनफ्लो (Inflow) के बिल्कुल उलट था, जिससे निवेशकों की बिकवाली का अंदाजा लगाया जा सकता है। FPIs ने मार्च के हर ट्रेडिंग दिन भारतीय इक्विटीज़ (Equities) बेचे, जो भारी रिस्क एवर्जन (Risk Aversion) का संकेत था।
भू-राजनीतिक तनाव और तेल का 'हाहाकार'
इस पूंजी पलायन (Capital Flight) का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव था, जिसने प्रमुख शिपिंग मार्गों को बाधित किया। इसके चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के ऊपर चली गईं और मार्च की शुरुआत में $119.5 तक पहुंच गईं। भारत, जो अपनी 85% से ज़्यादा तेल की ज़रूरतें आयात (Import) करता है, के लिए यह कीमतों में उछाल महंगाई (Inflation), व्यापार घाटे (Trade Deficit) और रुपये की स्थिरता के लिए बड़ी चिंता का सबब बन गया। इसी वजह से भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लुढ़ककर ₹92-₹94 के स्तर पर आ गया, जिससे आयात महंगा हो गया।
सेक्टर-वार परफॉरमेंस: कुछ तेज़ी, कुछ गिरावट
हालांकि, बाज़ार के विश्लेषकों का कहना है कि यह सिर्फ एक 'रिस्क-ऑफ' (Risk-off) सेंटिमेंट नहीं था। फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर से करीब ₹60,655 करोड़ का भारी FPI आउटफ्लो देखा गया, जिससे Nifty Bank इंडेक्स 17% से ज़्यादा गिर गया। पर, सेक्टर की क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) और एसेट क्वालिटी (Asset Quality) अभी भी मजबूत बनी हुई है।
इसके विपरीत, ऑटो सेक्टर (Auto Sector) में ₹12,498 करोड़ के आउटफ्लो के बावजूद, मार्च में ईयर-ऑन-ईयर (Year-on-Year) बिक्री में शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई, खासकर टू-व्हीलर्स और पैसेंजर कारों की। वहीं, मेटल्स सेक्टर (Metals Sector) में ₹3,000 करोड़ से ज़्यादा के आउटफ्लो के बाद शुरुआती मार्च में Nifty Metal इंडेक्स में 3% की बढ़त देखी गई, जिसका कारण ग्लोबल कमोडिटी कीमतों (Commodity Prices) में उछाल और अच्छे कॉर्पोरेट नतीजे रहे।
ऐतिहासिक सबक और बने हुए जोखिम
ऐतिहासिक रूप से, भारतीय इक्विटी बाज़ार तेल के झटकों और भू-राजनीतिक घटनाओं पर तेज़ी से प्रतिक्रिया करते आए हैं। पर, पिछला डेटा बताता है कि ऐसे झटकों के 12 महीनों के बाद बाज़ार अक्सर बेहतर रिटर्न देते हैं।
हालांकि, भारत की बाहरी निर्भरता को देखते हुए जोखिम बने हुए हैं। तेल की कीमतों में लगातार $100 प्रति बैरल से ऊपर रहने पर GDP ग्रोथ 0.3-0.5% तक घट सकती है। वहीं, कमजोर रुपया महंगाई को और बढ़ाएगा। 4.75% के करीब पहुंचे US Treasury Yields भी उभरते बाज़ारों से पूंजी खींच रहे हैं। JM Financial की एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में 40% Nifty 50 कंपनियों के FY27 EPS अनुमानों में कटौती की गई, खासकर एविएशन और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में, तेल की बढ़ती लागत के कारण।
डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स का सहारा और रिकवरी की उम्मीद
गिरावट के बावजूद, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने 32 महीने की अपनी लगातार खरीदारी जारी रखी, जो SIP फ्लोज़ (SIP Flows) के चलते मज़बूत बनी हुई है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो अप्रैल में बाज़ार में रिकवरी (Recovery) देखी जा सकती है। शेयर वैल्यूएशन्स (Valuations) अब ज़्यादा वाजिब लग रहे हैं और सरकारी नीतियों के सपोर्ट से अर्निंग्स डाउनग्रेड्स (Earnings Downgrades) भी स्थिर हो रहे हैं।