बाजार की घबराहट की असली वजह
अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से मिले मिले-जुले संकेतों और लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण भारतीय शेयर बाजारों पर दबाव बना हुआ है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव कच्चे तेल की कीमतों को $115 प्रति बैरल के पार ले गया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में यह महंगाई के मोर्चे पर एक बड़ी चिंता का सबब है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी से भारत की महंगाई दर 55 से 60 बेसिस पॉइंट बढ़ सकती है और करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) 30 से 40 बेसिस पॉइंट चौड़ा हो सकता है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा और कंपनियों के मुनाफे पर भी दबाव आएगा। ऐसे में Reserve Bank of India (RBI) ब्याज दरों में नरमी लाने से हिचकिचा सकती है, भले ही इकोनॉमिक ग्रोथ थोड़ी धीमी पड़ती दिखे।
वैल्यूएशन और FIIs का डर
Elara Capital के विश्लेषकों के अनुसार, Nifty 50 फिलहाल अपने 10-साल के औसत से करीब 7% नीचे 17.3 गुना फॉरवर्ड अर्निंग्स पर ट्रेड कर रहा है। हालांकि, यह लेवल ऐतिहासिक रूप से सपोर्ट का काम करता आया है, लेकिन भारत का फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग्स रेशियो (P/E ratio) अभी भी कई क्षेत्रीय उभरते बाजारों (Emerging Markets) से ज्यादा है। चीन, साउथ कोरिया और हांगकांग जैसे देशों के बाजार कम मल्टीपल पर ट्रेड कर रहे हैं, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए भारत का प्रीमियम वैल्यूएशन (premium valuation) कम आकर्षक हो जाता है, खासकर जब वे सस्ते विकल्प तलाश रहे हों।
FIIs बेच रहे, DIIs खरीद रहे - क्या यह जारी रहेगा?
बाजार में एक स्पष्ट विभाजन देखने को मिल रहा है। Foreign Institutional Investors (FIIs) लगातार बिकवाली कर रहे हैं। पिछले कारोबारी सत्र में उन्होंने ₹8,167 करोड़ का माल बेचा, और पिछले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में तो उन्होंने रिकॉर्ड ₹1.6-1.8 लाख करोड़ की निकासी की थी। वहीं, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs), जिसमें म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) और रिटेल निवेशक (Retail investors) शामिल हैं, ₹8,000 करोड़ से ज्यादा की खरीदारी कर बाजार को मजबूती दे रहे हैं।
यह डोमेस्टिक खरीदारी ही है जो बाजार को गिरने से बचा रही है और कई अन्य उभरते बाजारों की तुलना में जहां FIIs की बिकवाली हावी है, वहां भारत ने बेहतर प्रदर्शन किया है। लेकिन, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के सामने डोमेस्टिक फ्लो (domestic flow) कितने समय तक बाजार को थामे रख पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है। FIIs, खासकर वैल्यूएशन प्रीमियम और भू-राजनीतिक चिंताओं के प्रति संवेदनशील होते हैं।
सेक्टर पर असर और आगे की राह
कमोडिटी (Commodity) पर निर्भर और कंज्यूमर खर्च (consumer spending) से जुड़े ऑटो (Auto) और कंज्यूमर गुड्स (Consumer Goods) जैसे सेक्टर महंगे एनर्जी कॉस्ट (energy cost) और कमजोर कंज्यूमर परचेजिंग पावर (consumer purchasing power) के कारण दबाव में आ सकते हैं। वहीं, बैंकिंग और कैपिटल गुड्स (Capital Goods) जैसे सेक्टर डोमेस्टिक डिमांड और सरकारी खर्च से फायदा उठा सकते हैं। हालांकि, बैंकों के लिए बढ़ती ब्याज दरें प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) को कम कर सकती हैं।
बाजार के प्रतिभागी भू-राजनीतिक घटनाओं और तेल की कीमतों पर उनकी चाल पर बारीकी से नजर रखेंगे। RBI के पॉलिसी फैसले भी महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल, बाजार डोमेस्टिक फ्लो पर काफी हद तक निर्भर दिख रहा है, जो FIIs की बिकवाली को ऑफसेट कर रहा है। यह संतुलन नाजुक है और वैश्विक लिक्विडिटी (global liquidity) या निवेशक भावना में बदलाव से बिगड़ सकता है।