पिछले हफ्ते शेयर बाज़ार में आई बड़ी गिरावट के बाद, गुरुवार को भारतीय बाज़ार मामूली बढ़त के साथ खुल सकते हैं। बेंचमार्क Nifty 50 इंडेक्स पिछले हफ्ते 2.8% लुढ़क गया था और छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया था। दुनियाभर के बाज़ारों में मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल की कीमतों में तेज़ी से घबराहट थी। हालांकि, एशियाई बाज़ार और वॉल स्ट्रीट में थोड़ी रिकवरी देखी गई, लेकिन निवेशकों का सेंटिमेंट अभी भी नाजुक बना हुआ है।
इस बाज़ार की चिंता का मुख्य कारण मध्य पूर्व में बढ़ा हुआ संघर्ष है, जिसने कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स $82.77 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, और WTI फ्यूचर्स में भी मजबूती देखी जा रही है। यह तेज़ी भारत के लिए खास तौर पर चिंताजनक है, क्योंकि देश अपनी 85% से ज़्यादा कच्चे तेल की ज़रूरतें आयात करता है। तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से ट्रेड डेफिसिट और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर असर पड़ता है, और महंगाई बढ़ सकती है। अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का CAD 35-50 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकता है और अगर यह पूरी तरह से पास ऑन हुआ तो महंगाई में 20-25 बेसिस पॉइंट का इज़ाफ़ा हो सकता है।
बाज़ार में एक और अहम पहलू संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) की गतिविधियों में भारी अंतर है। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) लगातार बिकवाली कर रहे हैं, जिन्होंने इस महीने (4 मार्च तक) ₹12,048.29 करोड़ की नेट बिकवाली की है। यह वैश्विक निवेशकों की जोखिम से बचने की रणनीति को दिखाता है। इसके विपरीत, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) इस बिकवाली के दबाव को लगातार खरीदकर झेल रहे हैं, जिन्होंने इसी अवधि में करीब ₹20,662.04 करोड़ का नेट इनफ्लो दर्ज किया है। DIIs की यह लगातार खरीदारी बाज़ार को बड़ी गिरावट से बचा रही है।
हालांकि बाज़ार में सावधानी का माहौल है, कुछ खास घरेलू सेक्टर ऐसे हैं जिन्हें इसका फ़ायदा मिल सकता है। एनालिस्ट्स अपस्ट्रीम ऑयल एंड गैस कंपनियों की ओर इशारा कर रहे हैं, जिन्हें बढ़ती एनर्जी कीमतों से लाभ हो सकता है। अनुमान है कि भारतीय ऑयल एंड गैस अपस्ट्रीम मार्केट 5% के CAGR से बढ़ेगा। साथ ही, डिफेंस सेक्टर भी काफी ध्यान खींच रहा है। दुनिया भर में भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं और भारत की डिफेंस को आत्मनिर्भर बनाने की प्रतिबद्धता इस सेक्टर के लिए मज़बूत ग्रोथ केस तैयार कर रही है। डिफेंस पर कैपिटल आउटले कम से कम 15% बढ़ने की उम्मीद है।
फिलहाल Nifty 50 का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो करीब 21.4 है, जो न्यूट्रल से सतर्क ज़ोन में माना जाता है। इसका डिविडेंड यील्ड लगभग 1.27% है। ऐतिहासिक रूप से, जब Nifty PE 22 से ऊपर गया है, तो अगले तीन सालों में इक्विटी रिटर्न निगेटिव रहा है। पिछले क्षेत्रीय संघर्षों ने भारतीय बाज़ारों पर अस्थायी असर दिखाया है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को प्रभावित करने वाले किसी भी लंबे संघर्ष से बड़ा मैक्रोइकॉनॉमिक जोखिम पैदा हो सकता है।
भारत का बाज़ार अपने उभरते बाज़ार के साथियों (Emerging Market peers) से पिछड़ रहा है। 2025 में, MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में बड़ी तेजी के बावजूद, भारत की बढ़त मामूली रही। MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में भारत का वेटेज 14% से नीचे चला गया है।
FIIs की लगातार बिकवाली एक बड़ा जोखिम है, जो भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच उभरते बाज़ारों से वैश्विक पलायन का संकेत देती है। भारत की तेल आयात पर उच्च निर्भरता इसे आपूर्ति में रुकावटों और कीमतों में अस्थिरता के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा ट्रांज़िट पॉइंट के लिए खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा, गिरता हुआ भारतीय रुपया (Rupee) तेल आयात की बढ़ती लागत और महंगाई के दबाव को और बढ़ा रहा है। बढ़ते ऊर्जा आयात बिल के कारण करंट अकाउंट डेफिसिट और फिस्कल स्ट्रेन (fiscal strain) का खतरा भी है।
आगे चलकर, विश्लेषकों को भू-राजनीतिक गतिशीलता और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण बाज़ार में सावधानी बने रहने की उम्मीद है। हालांकि, घरेलू थीम पर ध्यान केंद्रित रहने की संभावना है, खासकर ऑयल एंड गैस और डिफेंस सेक्टर में, जिन्हें रणनीतिक कारणों और मौजूदा वैश्विक माहौल के चलते लगातार रुचि मिलने की उम्मीद है। निवेशकों को चयनात्मक (selective) दृष्टिकोण अपनाने और कंपनियों के मजबूत घरेलू फंडामेंटल्स पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी जाती है।
