India Market Slumps: भू-राजनीतिक टेंशन और FPI की बिकवाली से शेयर बाजार में हाहाकार, सेंसेक्स **650** अंक गिरा!

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
India Market Slumps: भू-राजनीतिक टेंशन और FPI की बिकवाली से शेयर बाजार में हाहाकार, सेंसेक्स **650** अंक गिरा!
Overview

वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भारी बिकवाली के दबाव में भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार, **27 फरवरी 2026** को भारी गिरावट दर्ज की गई। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स **650** अंकों से अधिक टूटकर **81,589** पर आ गया, जबकि निफ्टी **228** अंक गिरकर **25,268** पर बंद हुआ।

सेक्टर्स में दिखा अलग-अलग रुख

भू-राजनीतिक चिंताओं और विदेशी निवेशकों (FPI) की बड़े पैमाने पर बिकवाली के बीच, भारतीय शेयर बाजार की तस्वीर मिली-जुली रही। जहां एक ओर रियल एस्टेट और ऑटो जैसे सेक्टर्स में सबसे ज़्यादा गिरावट आई, वहीं आईटी (IT) और ऑयल & गैस (Oil & Gas) सेक्टर्स ने मजबूती दिखाई। रियल एस्टेट इंडेक्स (Real Estate Index) लगभग 2% तक गिर गया, जबकि ऑटो, फाइनेंशियल सर्विसेज, एफएमसीजी (FMCG) और प्राइवेट बैंक्स जैसे सेक्टर्स में 1% से ज़्यादा की कमजोरी दर्ज की गई। इसके विपरीत, आईटी सेक्टर वैश्विक स्तर पर डिजिटल सेवाओं की लगातार मांग के चलते और ऑयल & गैस सेक्टर ऊर्जा सप्लाई में संभावित रुकावटों के डर से बढ़त पर रहे।

FPI की बिकवाली और DII की खरीदारी

बाजार पर लगातार विदेशी निवेशकों (FPI) का दबाव बना हुआ है। गुरुवार को FPIs ने ₹3,466 करोड़ के शेयर बेचे, जो बाजार सेंटिमेंट पर भारी पड़ रहा है। हालांकि, इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) की खरीदारी मजबूत बनी रही, जिससे गिरावट कुछ हद तक थमी। यह दिखाता है कि बाजार में अब एक तरह का बंटवारा (Bifurcation) देखने को मिल रहा है।

वैल्यूएशन और उभरते बाजारों से तुलना

फिलहाल, निफ्टी 50 (Nifty 50) लगभग 25 गुना के प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो पर ट्रेड कर रहा है, जिसे काफी महंगा माना जा रहा है। ऐसे में, नतीजों में निराशा या ब्याज दरों में बढ़ोतरी का खतरा बढ़ जाता है। अगर उभरते बाजारों की बात करें, तो चीन का CSI 300 इंडेक्स मामूली बढ़ा है, जबकि ब्राजील का Bovespa कमोडिटी की मजबूती के दम पर संभल रहा है। भारत पर कच्चे तेल के आयात पर बड़ी निर्भरता और भू-राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण ज़्यादा दबाव है, जिसका असर दूसरी अर्थव्यवस्थाओं पर कम है। भारत का कुल मार्केट कैप (Market Cap) लगभग $4.5 ट्रिलियन है।

पिछली घटनाएं और मैक्रो इकोनॉमिक कमजोरियां

ऐतिहासिक तौर पर, भू-राजनीतिक तनाव के समय भारतीय शेयर बाजार में तेज, लेकिन अक्सर अस्थायी गिरावट देखी गई है। ऐसे समय में रिकवरी मजबूत घरेलू फंडामेंटल्स या वैश्विक प्रोत्साहन पैकेजों से ही हुई है। लेकिन, FPIs का लगातार पैसा निकालना बाजार में बड़ी करेक्शन का संकेत हो सकता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि देश एक बड़ा एनर्जी इंपोर्टर है। ऊंची तेल की कीमतें भारतीय रुपये पर सीधा नकारात्मक असर डालती हैं, जिससे पूंजी बाहर जा सकती है और फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) पर दबाव बढ़ सकता है।

आगे का नज़रिया

बाजार में फिलहाल कुछ डिफेंसिव सेक्टर्स में मजबूती दिख रही है, लेकिन बड़े जोखिम बने हुए हैं। निफ्टी 50 का ऊंचा P/E रेश्यो बाजार को किसी भी प्रतिकूल खबर के प्रति संवेदनशील बनाता है। FPIs की लगातार बिकवाली से बाजार में और गिरावट आ सकती है। भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, आर्थिक विकास और महंगाई दोनों के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

निवेशकों के लिए सलाह

बाजार में उथल-पुथल के इस दौर में, निवेशकों को अनुशासित और चुनिंदा निवेश रणनीति अपनानी चाहिए। फंडामेंटली मजबूत स्टॉक्स पर फोकस करना बेहतर होगा। टेक्निकल एनालिस्ट्स (Technical Analysts) के मुताबिक, निफ्टी में 25,800 के स्तर से ऊपर एक स्पष्ट और टिकाऊ ब्रेकआउट नई खरीदारी का संकेत देगा। अल्पावधि में उतार-चढ़ाव जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन भारत का लॉन्ग-टर्म आउटलुक स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स और अनुकूल जनसांख्यिकी (Demographics) के कारण पॉजिटिव बना हुआ है।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.