साल 2022 से 2025 के बीच भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ रेट औसतन **4.15%** रही, जो ग्लोबल औसत से लगभग **2%** ज्यादा है। यह बड़ा बदलाव ग्लोबल कंपनियों द्वारा चीन से सप्लाई चेन डाइवर्सिफाई करने का नतीजा है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ा खर्च और सरकारी इंसेंटिव स्कीमों ने इस ग्रोथ में अहम भूमिका निभाई है।
मैन्युफैक्चरिंग में भारत की धाक
भारत अब दुनिया में एक अहम मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर उभरा है। एसोचैम (ASSOCHAM) की एक हालिया स्टडी के मुताबिक, 2022-2025 के दौरान देश का इंडस्ट्रियल ग्रोथ 4.15% रहा। यह कोरोना महामारी से पहले 2016-2019 के 3.44% ग्रोथ रेट के मुकाबले काफी अच्छी बढ़त है।
China+1 रणनीति का गेम चेंजर
इस शानदार परफॉर्मेंस की एक बड़ी वजह ग्लोबल 'China+1' स्ट्रेटेजी है। इसके तहत मल्टीनेशनल कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए प्रोडक्शन यूनिट्स को कई देशों में फैला रही हैं। भारत इस डाइवर्सिफिकेशन के लिए एक पसंदीदा जगह बनकर उभरा है। देश की बढ़ती लोकल कंजम्पशन, बेहतर लॉजिस्टिक्स और सरकार की बड़ी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स ने भी ग्रोथ को सपोर्ट किया है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स और पीएम गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान जैसी पहलों ने कामकाज की बाधाओं को कम किया है और प्रोजेक्ट्स की स्पीड बढ़ाई है।
ग्लोबल तुलना और क्षेत्रीय स्थिति
ASSOCHAM की स्टडी में दुनिया की टॉप 10 मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमीज का एनालिसिस किया गया, जो ग्लोबल आउटपुट का करीब 65% हैं। चीन अभी भी सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरर है, लेकिन उसकी ग्रोथ धीमी पड़ गई है। महामारी से पहले चीन की ग्रोथ ग्लोबल एवरेज से 2.4% ज्यादा थी, जो 2022-2025 में घटकर ग्लोबल नॉर्म से 2.26% नीचे आ गई। वहीं, भारत अब अमेरिका, जर्मनी और यूके जैसे डेवलप्ड देशों के साथ खड़ा है, जिन्होंने ग्लोबल बेंचमार्क को पार किया है। मेक्सिको इस स्पेस में टॉप परफॉर्मर बना हुआ है, जबकि रूस ने भी इंटरनेशनल एवरेज से ऊपर ग्रोथ दिखाई है।
आगे की राह और चुनौतियां
हालांकि, इस मैन्युफैक्चरिंग बूम की लॉन्ग-टर्म सक्सेस इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन नेटवर्क को कितना बेहतर बनाता है। एनालिस्ट्स का मानना है कि भारत में लॉजिस्टिक्स की कॉस्ट अभी भी कई कॉम्पिटिटिव मैन्युफैक्चरिंग हब्स से ज्यादा है, जिसका असर एक्सपोर्टेड गुड्स की फाइनल प्राइसिंग पर पड़ सकता है। इसके अलावा, ग्लोबल वैल्यू चेन्स में गहराई से जुड़ने, ट्रेड एग्रीमेंट्स और इंडस्ट्री 4.0 जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज को अपनाने से ही यह ग्रोथ सस्टेनेबल रह पाएगी। इन्वेस्टर्स को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि सरकारी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स कितनी तेजी से पूरे होते हैं और क्या वे इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे सेक्टर्स में प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ाते हैं।
