भारत का M&A बाज़ार 2025 में काफी परिपक्व (mature) होता दिखा, जहाँ कुल डील वैल्यू 18% बढ़कर $123.8 बिलियन हो गई, जो 2024 के $106.3 बिलियन से ज़्यादा है। यह उछाल तब आया जब डील्स की संख्या 3% घटी। यह साफ़ संकेत है कि इन्वेस्टर अब क्वालिटी और लंबी अवधि की वैल्यू पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। भू-राजनीतिक (geopolitical) बदलावों और ग्लोबल अनिश्चितता के माहौल में, कंपनियाँ अब बड़ी और स्ट्रैटेजिक डील्स को प्राथमिकता दे रही हैं, और सौदों को अंतिम रूप देने से पहले की जाने वाली ड्यू डिलिजेंस (due diligence) पर ज़्यादा समय और संसाधन लगा रही हैं। EY के मैनेजिंग पार्टनर स्ट्रैटेजी एंड ट्रांजेक्शन्स, अमित खंडेलवाल के अनुसार, यह कदम क्वालिटी और स्ट्रैटेजिक फिट को वॉल्यूम से ऊपर रखने का है। इस दौरान, भारतीय शेयर बाज़ारों जैसे NIFTY 50 और BSE SENSEX ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में लगभग 5% और 7% की मामूली गिरावट देखी, जो दिखाता है कि M&A का पैसा स्टॉक मार्केट के सामान्य ट्रेंड से अलग चल रहा है।
सेक्टर की बात करें तो इंफ्रास्ट्रक्चर में डील वैल्यू 35% बढ़कर $24.6 बिलियन रही, भले ही इस सेक्टर में डील्स की संख्या 18% गिरी। इंडस्ट्रियल और ऑटोमोटिव सेक्टर्स ने वैल्यू के मामले में सबसे ज़्यादा ग्रोथ दिखाई, जो 105% तक बढ़ गई, जबकि डील्स वॉल्यूम में 4% की मामूली बढ़त दिखी। प्राइवेट इक्विटी (PE) का मैन्युफैक्चरिंग में इंटरेस्ट बना रहा, खासकर इंजीनियर्ड प्रोडक्ट्स, ऑटो कंपोनेंट्स, प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स में। क्रॉस-बॉर्डर M&A में डील्स की संख्या 20% कम हुई, लेकिन वैल्यू 155% उछलकर $33.2 बिलियन पर पहुँच गई। यह उछाल ग्लोबल कंपनियों द्वारा भारतीय एसेट्स को सुरक्षित करने की कोशिशों से आया, ताकि सप्लाई चेन को री-कॉन्फ़िगर किया जा सके। फाइनेंशियल सर्विसेज़ (BFSI) सेक्टर भी अहम रहा, जिसने कुल M&A वैल्यू का 26% से ज़्यादा हिस्सा कवर किया, जिसमें जापानी और मध्य पूर्वी फाइनेंशियल प्लेयर्स से बड़े इनबाउंड निवेश शामिल थे।
वैश्विक रुझानों की तुलना में, भारत के M&A मार्केट ने ज़बरदस्त लचीलापन (resilience) दिखाया है। दुनिया भर में M&A एक्टिविटी में 43% की वृद्धि के साथ डील वैल्यू $4.7 ट्रिलियन हो गई, जिसका मुख्य कारण बड़ी 'मेगा-डील्स' थीं। भारत का स्ट्रैटेजिक निवेश को आकर्षित करने में सफल होना, ख़ासकर भू-राजनीतिक तनावों के बीच, उभरते बाज़ारों में इसे अलग खड़ा करता है। भारत के आर्थिक फंडामेंटल्स एक स्थिर आधार प्रदान करते हैं, जहाँ 2026 तक GDP ग्रोथ 6.5-6.7% रहने का अनुमान है। इसके अलावा, रेगुलेटरी रिफॉर्म्स, जैसे कि कंपनीज़ एक्ट (Companies Act) में संशोधन जो क्रॉस-बॉर्डर मर्जर को आसान बनाते हैं, और कॉम्पीटिशन एक्ट (Competition Act) के तहत मर्जर कंट्रोल में अपडेट, डील्स की प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और इन्वेस्टर कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
हालांकि, चयनात्मकता (selectivity) की ओर यह कदम अपने जोखिम और चुनौतियाँ भी लाता है। ज़्यादा परसेप्शन वाले बिज़नेस रिस्क के लिए ज़्यादा गहन और समय लेने वाली ड्यू डिलिजेंस की ज़रूरत होती है, जिससे ट्रांज़ैक्शन कॉस्ट बढ़ सकती है और टाइमलाइन लंबी हो सकती है। भू-राजनीतिक अनिश्चितताएँ और ऊर्जा की स्थिति लगातार सावधानी पैदा कर रही हैं, जो बिज़नेस वायबिलिटी पर एक महत्वपूर्ण फोकस डाल रही हैं। मर्जर कंट्रोल नियमों में बदलाव और कॉम्पीटिशन लॉ के तहत संभावित ज़्यादा कंप्लायंस की मांगें भी बाधाएँ पेश करती हैं। जबकि स्ट्रैटेजिक M&A वैल्यू बढ़ रही है, फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में भारतीय इक्विटी बेंचमार्क का सुस्त प्रदर्शन दिखाता है कि ब्रॉडर मार्केट सेंटीमेंट पूरी तरह से तालमेल में नहीं है। यह डिस्कनेक्ट उन टारगेट कंपनियों के लिए वैल्यूएशन रिस्क पैदा कर सकता है जिनमें मजबूत स्ट्रैटेजिक पोजिशनिंग की कमी है।
इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि 2026 में भारत में डील एक्टिविटी मजबूत बनी रहेगी, जहाँ डीलमेकर्स बड़ी, हाई-वैल्यू ट्रांज़ैक्शन्स पर अपना फ़ोकस बनाए रखेंगे। विश्लेषकों को उम्मीद है कि भारत की ग्रोथ पोटेंशियल और ग्लोबल सप्लाई चेन में इसकी अहम भूमिका के दम पर इन्वेस्टर कॉन्फिडेंस स्थिर रहेगा। टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर्स में भविष्य के M&A अवसरों का नेतृत्व करने की उम्मीद है, साथ ही कंसॉलिडेशन (consolidation) और इनबाउंड निवेश भी जारी रहेगा। मैक्रोइकॉनॉमिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद, भारत का अनुकूल रेगुलेटरी माहौल और मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, लगातार डीलमेकिंग मोमेंटम को सपोर्ट करेगा।
