India Corporate Tax: लिस्टेड कंपनियों का दबदबा बढ़ा! अनलिस्टेड पीछे छूटे, कैपिटल एक्सेस बनी मुख्य वजह

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Corporate Tax: लिस्टेड कंपनियों का दबदबा बढ़ा! अनलिस्टेड पीछे छूटे, कैपिटल एक्सेस बनी मुख्य वजह
Overview

भारत में कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन के मामले में लिस्टेड कंपनियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है, जबकि अनलिस्टेड कंपनियां पीछे छूट रही हैं। इसकी मुख्य वजह लिस्टेड कंपनियों की बेहतर कैपिटल एक्सेस है, जिसने उन्हें एक बड़ा Competitive Moat दिया है।

कैपिटल एक्सेस का बढ़ता फ़ायदा: लिस्टेड कंपनियां टैक्स कलेक्शन में आगे, अनलिस्टेड पीछे

भारत के टैक्स परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहाँ पब्लिकली लिस्टेड कंपनियां अपने अनलिस्टेड साथियों की तुलना में कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन में काफी आगे निकल गई हैं। NSE की मार्केट पल्स रिपोर्ट के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2025 तक कुल कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन में अनलिस्टेड कंपनियों की हिस्सेदारी घटकर 47% रह गई है, जो फाइनेंशियल ईयर 2019 में 55.6% थी। यह अंतर सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि लिस्टेड कंपनियों के पास मौजूद बेहतर कैपिटल एक्सेस के कारण पैदा हुआ एक स्ट्रक्चरल एडवांटेज है।

कैपिटल की ताकत से बनी बड़ी खाई

खासकर कोरोना महामारी के दौर में यह ट्रेंड और तेज़ हुआ। फाइनेंशियल ईयर 2021 में जहां लिस्टेड कंपनियों के टैक्स भुगतान में 22% की बढ़ोतरी हुई, वहीं अनलिस्टेड कंपनियों के टैक्स में भारी 45% की गिरावट आई। इसके चलते फाइनेंशियल ईयर 2021 में लिस्टेड कंपनियों का टैक्स कलेक्शन में हिस्सा 18 साल के उच्चतम स्तर 60.6% पर पहुंच गया। हालाँकि अनलिस्टेड कंपनियों ने बाद में वापसी की है, लेकिन वे महामारी से पहले के स्तर पर नहीं आ पाई हैं।

लिस्टेड कंपनियों का यह लगातार बेहतर प्रदर्शन उनकी कैपिटल मार्केट तक आसान पहुंच का सीधा नतीजा है। बैंक फाइनेंसिंग के अलावा, लिस्टेड कंपनियां आसानी से बॉन्ड और इक्विटी मार्केट का सहारा ले सकती हैं। इससे उन्हें टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड सिस्टम्स और ऑपरेशन्स को बेहतर बनाने में भारी निवेश करने में मदद मिलती है। इस निवेश से उनके कामकाज में फॉर्मलाइजेशन बढ़ता है, कॉस्ट कंट्रोल बेहतर होता है और वे इंटरनेशनल मार्केट की डिमांड पूरी करने के लिए तैयार होती हैं। यह सब मिलकर ग्रोथ को बढ़ाता है और टैक्स कलेक्शन को भी।

ऐतिहासिक आंकड़े और आर्थिक समीकरण

ऐतिहासिक रूप से देखें तो 1990 के दशक के अंत से ही कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन, पर्सनल इनकम टैक्स से ज़्यादा रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2019 और 2024 के बीच, कुल कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन में लगभग 50% की बढ़ोतरी हुई है। यह ट्रेंड भारत की उस आर्थिक तस्वीर से मेल खाता है, जहाँ GDP ग्रोथ का सीधा असर कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन पर पड़ता है। इसके अलावा, भारत में बढ़ता फॉर्मलाइजेशन और डिजिटलाइजेशन, जैसे कि GST जैसे इनिशिएटिव्स, सीधे तौर पर ऑर्गेनाइज्ड और लिस्टेड कंपनियों को फायदा पहुंचाते हैं, जो तेज़ी से बदलावों को अपनाने और स्केल करने में सक्षम हैं। नॉन-बैंक और मार्केट-बेस्ड फाइनेंसिंग में भी बढ़ोतरी हुई है, जिसने लिस्टेड कंपनियों के लिए फंड जुटाने के कई रास्ते खोले हैं।

रेगुलेटरी नज़र और मार्केट की सोच

वित्तीय प्रदर्शन और टैक्स योगदान में यह बढ़ती खाई नियामकों की नज़र से छिपी नहीं है। SEBI जैसी संस्थाएं तेज़ी से बढ़ते अनलिस्टेड शेयर मार्केट की जांच कर रही हैं। अनलिस्टेड ट्रेड और फाइनल IPO वैल्यूएशन के बीच कीमत का अंतर, पारदर्शिता की कमी और लिक्विडिटी की दिक्कतें रेगुलेटर्स की चिंताएं बढ़ा रही हैं। हालाँकि अनलिस्टेड कंपनियों पर कंप्लायंस का बोझ कम हो सकता है, लेकिन उनमें पब्लिक मार्केट जैसी निवेशक सुरक्षा और ट्रांसपेरेंसी की कमी होती है, जिससे वैल्यूएशन और लिक्विडिटी के जोखिम बढ़ जाते हैं। लिस्टेड कंपनियों के लिए एक्सपेंशन, M&A और कर्ज घटाने के लिए कैपिटल जुटाने की क्षमता, उनके प्राइवेट साथियों की तुलना में वैल्यूएशन पोटेंशियल और स्टेबिलिटी को भी बढ़ाती है।

भविष्य की राह: अंतर बढ़ने की उम्मीद

लिस्टेड कंपनियों के स्ट्रक्चरल फायदे, खासकर कैपिटल एक्सेस की बेहतर सुविधा, उन्हें अनलिस्टेड साथियों पर आगे रहने में मदद करती रहेगी। जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था फॉर्मलाइजेशन, टेक्नोलॉजी एडॉप्शन और बढ़ते निवेश से आगे बढ़ेगी, यह कैपिटल Moat और चौड़ा होने की उम्मीद है। इससे लिस्टेड सेगमेंट से ग्रोथ और टैक्स कलेक्शन में लगातार बढ़ोतरी होगी, जो राष्ट्रीय खजाने में उनकी हिस्सेदारी को और मज़बूत करेगा और दोनों कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर्स के बीच एक स्पष्ट विभाजन पैदा करेगा।

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