भारत का बड़ा फैसला: चीन को मैन्युफैक्चरिंग में मिलेगी छूट, पर सेमीकंडक्टर में सख्ती जारी!

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का बड़ा फैसला: चीन को मैन्युफैक्चरिंग में मिलेगी छूट, पर सेमीकंडक्टर में सख्ती जारी!
Overview

भारत सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए उन देशों से आने वाले निवेश के नियमों को आसान कर दिया है जिनकी सीमा भारत से लगती है, जिसमें चीन भी शामिल है। इस फैसले के तहत, कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा जैसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स में अब आसानी से पैसा लगाया जा सकेगा। हालांकि, सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक (strategic) क्षेत्रों में सख्ती पहले जैसी ही बनी रहेगी।

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यह फैसला उन देशों के लिए एफडीआई (FDI - फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) के नियमों में बदलाव लाता है जिनकी सीमा भारत से लगती है। इसमें चीन भी शामिल है। नए नियमों के तहत, कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और सौर ऊर्जा से जुड़े सामान जैसे पॉलीसिलिकॉन और इनगोट-वेफर्स जैसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स में निवेश का रास्ता खोला गया है। सरकार का लक्ष्य है कि इससे भारत की लोकल प्रोडक्शन क्षमता मजबूत हो, ग्लोबल सप्लाई चेन में बेहतर जगह मिले और देश मैन्युफैक्चरिंग हब बन सके। यह 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे कदमों को भी आगे बढ़ाएगा। लेकिन, सेमीकंडक्टर जैसे हाई-टेक और रणनीतिक (strategic) क्षेत्रों में सख्त कंट्रोल बनाए रखा गया है, ताकि टेक्नोलॉजी के मामले में आत्मनिर्भरता बनी रहे।

निवेश प्रस्तावों के लिए नए नियम तय किए गए हैं। इन सेक्टर्स में 10% की सीमा तक के निवेश को ऑटोमैटिक अप्रूवल (automatic approval) मिल जाएगा। सबसे खास बात यह है कि कंपनी का ज्यादातर मालिकाना हक (majority ownership) और कंट्रोल हमेशा भारतीय नागरिकों या उनके द्वारा नियंत्रित एंटिटीज के पास ही रहना चाहिए। इसके अलावा, मनी लॉन्ड्रिंग (money laundering) के नियमों को ध्यान में रखते हुए 'बेनिफिशियल ओनर' (beneficial owner) यानी असली मालिक की जांच का क्लॉज भी जोड़ा गया है, ताकि बॉर्डर शेयरिंग देशों के निवेशकों की अच्छी तरह परख हो सके। ऐसे देशों से आने वाले निवेश प्रस्तावों के लिए 60 दिन की समय सीमा तय की गई है। इस प्रक्रिया को सेक्रेटरीज की एक कमेटी (Committee of Secretaries) संभालेगी, जो सेक्टर्स की लिस्ट को अपडेट भी कर सकती है। इस कदम से प्रपोजल्स में तेजी आएगी और लंबे इंतजार से मुक्ति मिलेगी, जैसा कि पहले प्रेस नोट 3 (PN3) के तहत होता था।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा जैसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स पर फोकस करना काफी अहम है। पिछले एक दशक में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का प्रोडक्शन वैल्यू छह गुना बढ़ा है, एक्सपोर्ट आठ गुना बढ़ा है और लोकल वैल्यू एडिशन 70% तक पहुंच गया है। डिक्सन टेक्नोलॉजीज (Dixon Technologies) जैसी कंपनियां इस पॉलिसी का फायदा उठा रही हैं। हाल ही में, उन्होंने चीन की लॉन्गचीर इंटेलिजेंस (Longcheer Intelligence) के साथ मिलकर स्मार्टफोन और AI PC जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर (joint venture) का ऐलान किया है, जिसमें डिक्सन का 74% स्टेक (stake) होगा। वहीं, सोलर सेक्टर भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसे सरकारी इंसेंटिव स्कीम्स और रिन्यूएबल एनर्जी टारगेट्स का सहारा है। हालांकि, सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री, जिसका 2030 तक मार्केट वैल्यू करीब $109 बिलियन होने का अनुमान है, अभी भी कड़े प्रतिबंधों के दायरे में है। भारत के सेमीकंडक्टर प्लान्स, जिसमें विकास के लिए $10 बिलियन का बजट है, ग्लोबल पॉलिटिक्स और बड़े टेक पार्टनरशिप पर निर्भर करते हैं। इस वजह से, सेमीकंडक्टर में विदेशी निवेश मुख्य रूप से सरकार द्वारा मंजूर की गई कंपनियों तक ही सीमित रहेगा।

इस पॉलिसी में बदलाव के बावजूद, कई जोखिम अभी भी बने हुए हैं। 'बेनिफिशियल ओनर' का नियम, जिसका मकसद असली भारतीय कंट्रोल सुनिश्चित करना है, मालिकी के जटिल ढांचे (complicated ownership setups) को जन्म दे सकता है। ऐसे ढांचों पर कड़ी निगरानी रखनी होगी ताकि प्रतिबंधित समूहों का अप्रत्यक्ष प्रभाव (indirect influence) न हो सके। इसके अलावा, सेमीकंडक्टर में निवेश की अनुमति न मिलने से भारत अभी भी ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों पर चिप सप्लायर्स के लिए निर्भर रहेगा, जो एक कमजोरी है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, जैसे कि ईरान से जुड़ा संघर्ष और उसका तेल की कीमतों पर असर, इमर्जिंग मार्केट्स के लिए चिंता का विषय है। $115 प्रति बैरल से ऊपर कच्चे तेल की कीमतें पहले ही निवेशकों को सतर्क कर चुकी हैं, जिससे पैसा भारत से बाहर जा रहा है और मार्केट में बिकवाली (sell-offs) हो रही है। इससे महंगाई (inflation) और अर्थव्यवस्था की स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। अप्रैल 2020 में लाया गया प्रेस नोट 3 (PN3), जिसे शुरू में COVID-19 के दौरान होस्टाइल टेकओवर (hostile takeovers) से बचाने और सुरक्षा चिंताओं के चलते लागू किया गया था, ने चीनी निवेश को संवेदनशील क्षेत्रों में धीमा कर दिया था। लेकिन इसके सख्त लागू होने से निवेशकों को लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा, और कई प्रपोजल 2024 के मध्य तक अटके रहे। चीन से आने वाला एफडीआई 2000-2020 के बीच $7 बिलियन से घटकर 2021-2025 के बीच $450 मिलियन से भी कम हो गया। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए 'बेनिफिशियल ओनरशिप' नियम नियमों का उल्लंघन होने से कितनी अच्छी तरह रोक पाते हैं।

सरकार का यह कदम, जो धीरे-धीरे और चुनिंदा क्षेत्रों में उठाया गया है, आगे बढ़ने का एक व्यावहारिक (practical) तरीका बताता है। यह बदलाव मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ के लिए पैसा आकर्षित करने की जरूरत को स्वीकार करता है, साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा और टेक्नोलॉजी की स्वतंत्रता को लेकर सावधानी भी बरतता है। इस रणनीति की सफलता स्पष्ट कार्यान्वयन (clear implementation), 'बेनिफिशियल ओनर' नियमों की मजबूत प्रवर्तन (strong enforcement) और लगातार बदलते वैश्विक राजनीतिक व आर्थिक चुनौतियों से निपटने की क्षमता पर निर्भर करेगी।

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