ट्रेड नेगोशिएशन में 'भविष्य' का दांव
कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने साफ किया है कि भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय ट्रेड (Trade) की रणनीति बदल रहा है। अब पुरानी आर्थिक ताकतों के बजाय, देश के भविष्य की आर्थिक क्षमता को बातचीत का मुख्य हथियार बनाया जा रहा है। अमेरिका के साथ हालिया टैरिफ डील (Tariff Deal) इसी नई सोच का एक बड़ा उदाहरण है। इस डील के तहत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर लगने वाले भारी टैरिफ को काफी कम कर दिया है।
अमेरिका से मिली बड़ी राहत, $35 ट्रिलियन का विजन
अमेरिका ने भारतीय एक्सपोर्ट्स (Exports) पर लगने वाले 50% तक के टैरिफ को घटाकर 18% कर दिया है, और कुछ खास सेक्टर जैसे फार्मा (Pharma), जेम्स (Gems) और डायमंड्स (Diamonds) के लिए तो इसे पूरी तरह खत्म ही कर दिया है। यह डील एक बड़े बायलैटरल ट्रेड एग्रीमेंट (Bilateral Trade Agreement - BTA) की नींव रख सकती है। मिनिस्टर गोयल के मुताबिक, यह बातचीत की ताकत भारत के $4 ट्रिलियन की मौजूदा इकॉनमी से बढ़कर 2047 तक $30-35 ट्रिलियन बनने के विजन से आती है। यह बड़ा लक्ष्य ही विदेशी पार्टनर्स को भारत जैसे तेजी से बढ़ते मार्केट में पैठ बनाने का मौका देता है। इसी सोच के साथ भारत यूरोपियन यूनियन (EU) और EFTA जैसे बड़े ब्लॉक के साथ भी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की ओर बढ़ रहा है, ताकि किसी एक पार्टनर पर निर्भरता कम हो सके।
क्या वाकई पूरा होगा $35 ट्रिलियन का सपना?
कई बड़ी संस्थाएं, जैसे नीति आयोग (NITI Aayog) और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स (PHDCCI), भी 2047 तक भारत की इकॉनमी को $30-35 ट्रिलियन तक पहुँचने का अनुमान लगाती हैं। लेकिन इसे हकीकत बनाने के लिए अगले कई दशकों तक हर साल 7-10% की लगातार जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) चाहिए होगी, जो कि एक बहुत बड़ी चुनौती है। एक्सपर्ट्स की मानें तो सिर्फ बड़ी इकॉनमी बनना ही 'डेवलप्ड नेशन' (Developed Nation) का दर्जा नहीं दिलाता, इसके लिए मानव विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चीजों में भी भारी सुधार जरूरी है। इसके अलावा, EU जैसी पार्टियों के साथ हुई डील में कुछ ऐसे समझौते हैं जिनसे उनके भारत में एक्सपोर्ट्स की वैल्यू शायद भारत के EU में एक्सपोर्ट्स से ज्यादा बढ़ सकती है। वैश्विक स्तर पर ट्रेड टेंशन (Trade Tension) और चीन की डोमिनेंस (Dominance) भी भारत के लिए रिस्क पैदा करती है।
$35 ट्रिलियन के विजन के सामने 'बेयर केस'
भविष्य की इकॉनमी के दम पर ट्रेड डील करना एक तरह का सट्टा है। 'डेवलप्ड नेशन' स्टेटस सिर्फ जीडीपी के आंकड़ों से नहीं आता; बढ़ती इनकम इनइक्वलिटी (Income Inequality), शहरी-ग्रामीण विभाजन और कमजोर सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर (Social Infrastructure) जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। हाल के सालों में लोगों की नेट फाइनेंशियल सेविंग्स (Net Financial Savings) कई दशकों के निचले स्तर पर आ गई हैं, जिससे डोमेस्टिक कैपिटल फॉर्मेशन (Domestic Capital Formation) कमजोर हुआ है। वहीं, कर्ज बढ़कर कंजम्पशन (Consumption) पर ज्यादा खर्च हो रहा है, जो लॉन्ग-टर्म रिस्क (Long-term Risk) पैदा कर सकता है। भारत का कैपिटल एफिशिएंसी (Capital Efficiency - ICOR) बढ़ाने के लिए भारी निवेश चाहिए, और किसी भी देरी से रिटर्न कम हो सकता है। इसके अलावा, नौकरशाही (Bureaucracy), भ्रष्टाचार (Corruption) और शिक्षा-स्वास्थ्य सुधारों की जरूरत जैसी स्ट्रक्चरल समस्याएं (Structural Issues) भी विकास की रफ्तार धीमी कर सकती हैं।
वैश्विक तनावों के बीच राह
भारत की यह मल्टी-प्रॉन्ग ट्रेड स्ट्रैटेजी (Multi-pronged Trade Strategy) दुनिया भर में बढ़ते प्रोटेक्शनिज्म (Protectionism) के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए है। अमेरिका के साथ ट्रेड डील ने एक्सपोर्ट के लिए रास्ते खोले हैं, लेकिन यह भारत के एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन्स (Export Destinations) को डाइवर्सिफाई (Diversify) करने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है। EU के साथ हुई डील को 'सबसे बड़ी डील' कहा जा रहा है, लेकिन इसमें भी कुछ कॉम्प्रोमाइजेज (Compromises) हैं और संवेदनशील मुद्दे अनसुलझे रह गए हैं। यह पोजिशनिंग भारत को अपनी शर्तों पर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ जुड़ने का मौका देती है, और यह दिखाता है कि विकास के उसके अपने रास्ते हैं। यह भारत को ट्रेड पॉलिसी का सिर्फ एक पैसिव रिसीवर (Passive Receiver) होने के बजाय, अपने आर्थिक भविष्य का सक्रिय आर्किटेक्ट (Active Architect) बनाता है।