भारत की कंपनियां मजदूरों की सुरक्षा से जुड़े लेबर लॉ को दरकिनार करने के अपने तरीके ढूंढती रहती हैं। यह एक पुरानी समस्या है, जिसमें कानूनों और उनके असल अमल (Enforcement) के बीच एक बड़ा गैप है। नया सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 लाए जाने के बावजूद, कंपनियां आज भी नियमों से बच निकलती हैं। इससे जहां बिजनेस के लिए जोखिम बढ़ता है, वहीं ज्यादातर वर्कर्स को कभी औपचारिक सुरक्षा नहीं मिल पाती।
लेबर लॉ का मकसद मजदूरों को सुरक्षा देना है, जिसे हाल ही में सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 में समेटा गया है। इसे इनफॉर्मल, गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स तक को कवर करने के लिए बनाया गया था। हालांकि, इन कानूनों को ज़मीनी हकीकत में लागू करना एक बड़ी चुनौती है। भारत की 90% से ज्यादा वर्कफोर्स इनफॉर्मल सेक्टर में है, जिनके पास अक्सर कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं होता, फिक्स्ड पे (Fixed Pay) नहीं मिलती, और हेल्थ इंश्योरेंस या प्रोविडेंट फंड जैसे बेनिफिट्स (Benefits) भी नहीं होते। इसी इनफॉर्मेलिटी के चलते, लाखों मजदूर शोषण का शिकार हो जाते हैं क्योंकि कानूनी सुरक्षा बेहद कमजोर है और एनफोर्समेंट (Enforcement) ठीक से नहीं होता। इंस्पेक्शन (Inspection) में यह भी सामने आया है कि कंपनियां अक्सर अपने कर्मचारियों की संख्या छुपा लेती हैं और रिकॉर्ड दिखाने से मना कर देती हैं, यह कहकर कि वह ऑडिटर्स (Auditors) के पास हैं। ये तरीके साफ बताते हैं कि एनफोर्समेंट कितना कमजोर है और निगरानी (Oversight) की भारी कमी है।
लेबर लॉ का पालन न करने से कंपनियों पर सिर्फ फाइन (Fine) या बाकी बची हुई पेमेंट (Back-pay) का ही जोखिम नहीं होता। इससे उनकी रेपुटेशन (Reputation) खराब हो सकती है, क्लाइंट्स (Clients) का भरोसा उठ सकता है और वर्कर्स के डिस्प्यूट (Disputes) के चलते ऑपरेशन्स (Operations) में रुकावट आ सकती है। भारत की जीडीपी (GDP) का एक बड़ा हिस्सा इनफॉर्मल इकोनॉमी (Informal Economy) से आता है, जहां कम निगरानी के कारण एक असमान खेल का मैदान (Uneven Playing Field) तैयार होता है। जो कंपनियां नियमों का पालन करती हैं, उनकी लागत (Costs) उन कंपनियों से ज्यादा हो सकती है जो ऐसा नहीं करतीं, जिससे कंप्लायंस (Compliance) पर असर पड़ता है। अलग-अलग राज्यों के जटिल कानूनों और सेंट्रल ट्रैकिंग (Central Tracking) की कमी से अनजाने में भी उल्लंघन हो सकते हैं, खासकर बढ़ती कंपनियों के लिए। यहां तक कि नया सोशल सिक्योरिटी कोड भी एडमिनिस्ट्रेटिव (Administrative) तौर पर तैयार न होने और वर्कर्स को उनके अधिकारों की जानकारी देने में बाधाओं का सामना कर रहा है।
भारत के इनफॉर्मल सेक्टर में, जहां देश के 80-90% वर्कर्स काम करते हैं, अपने आप में कई जोखिम छिपे हैं। लेबर लॉ इन वर्कर्स की सुरक्षा के लिए ही बने हैं, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि कड़े नियम नई नौकरियों के बनने में रुकावट डाल सकते हैं। यह एक संतुलन बनाने की चुनौती है: ऐसे कानून जो वर्कर्स को सुरक्षित रखें लेकिन नौकरियों को भी न रोकें, और साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि एनफोर्समेंट इतना भी ढीला न हो कि कंपनियां आसानी से बच निकलें। अलग-अलग राज्यों में एनफोर्समेंट की खंडित प्रकृति (Fragmented Nature) और लेबर कोड्स की अलग-अलग व्याख्याओं (Interpretations) से भी अप्रत्याशित कानूनी समस्याएं और उन कंपनियों के लिए भारी पेनाल्टी (Penalties) हो सकती हैं जो पूरी तरह से कंप्लायंट (Compliant) नहीं हैं।
एनफोर्समेंट गैप को भरने के लिए सामान्य शिकायतों से हटकर, खास और डेटा-आधारित एक्शन्स (Data-backed Actions) की ओर बढ़ना होगा। ट्रेड यूनियंस (Trade Unions) और वर्कर्स के पैरोकारों (Advocates) से कहा जा रहा है कि वे लेबर ऑफिसेज (Labor Offices) को नॉन-कंप्लायंस (Non-compliance) की सटीक जानकारी दें, जिसमें कंपनी का नाम, कितने लोग शामिल हैं, और सबूत (Documented Evidence) शामिल हों। इससे टारगेटेड इंस्पेक्शन्स (Targeted Inspections) और ज्यादा असरदार रेगुलेशन (Regulation) हो पाएगा। कंप्लायंस और वर्कर के मुद्दों को ट्रैक करने के लिए डिजिटल टूल्स (Digital Tools) का इस्तेमाल करने से भी पारदर्शिता (Transparency) बढ़ सकती है। आखिरकार, भारत के लेबर सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए सरकार, बिजनेस और वर्कर्स के मिले-जुले प्रयास की जरूरत है, ताकि एनफोर्समेंट को मजबूत किया जा सके और यह सुनिश्चित हो कि कानून सभी की, खासकर इनफॉर्मल सेक्टर में काम करने वालों की, वास्तव में सुरक्षा कर सकें।
