महंगाई का झटका! जून में 4.38% पहुंची CPI, RBI के टारगेट से ऊपर

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AuthorMehul Desai|Published at:
महंगाई का झटका! जून में 4.38% पहुंची CPI, RBI के टारगेट से ऊपर

भारत में खुदरा महंगाई जून महीने में बढ़कर 4.38% पर पहुंच गई है, जो पिछले 6 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। यह बढ़ोतरी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के 4% के आरामदायक स्तर को पार कर गई है। ईंधन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों ने महंगाई को यह झटका दिया है।

महंगाई में क्यों आई तेजी?

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खुदरा महंगाई दर जून में बढ़कर 4.38% हो गई, जो मई में 3.93% थी। यह दर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4% के लक्ष्य से ऊपर निकल गई है, जिससे आगे ब्याज दरों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

इस बढ़ोतरी की मुख्य वजहें ईंधन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें हैं। आंकड़ों के मुताबिक, परिवहन लागत, जो सीधे तौर पर ईंधन की कीमतों से जुड़ी है, इसमें आधे हिस्से का योगदान रहा। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी ने इसे सीधे तौर पर प्रभावित किया। खाद्य महंगाई दर भी 5% के पार निकल गई, खासकर तेल, वसा, फल और पैक्ड फूड आइटम्स के दाम बढ़े हैं। हालांकि, अनाज और दालों जैसी मुख्य वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता देखी गई, लेकिन समग्र रूप से खाद्य पदार्थों के दाम महंगाई को बढ़ाते रहे।

आगे क्या?

केंद्रीय बैंक के लिए चुनौती यह है कि कीमतों पर दबाव बना हुआ है। ईंधन की कीमतें वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित होती हैं। वहीं, खाद्य पदार्थों के मोर्चे पर मानसून एक महत्वपूर्ण कारक है। यदि मानसून सामान्य से कम रहा या उसका वितरण असमान रहा, तो खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जिससे खाद्य पदार्थ और महंगे हो सकते हैं। RBI ने चालू वित्त वर्ष के लिए महंगाई दर औसतन 5.1% रहने का अनुमान लगाया था, और जून के आंकड़े बताते हैं कि जोखिम अभी भी बने हुए हैं।

ब्याज दरों पर क्या होगा?

हालांकि, खाद्य और ईंधन को छोड़कर मुख्य महंगाई दर (Core Inflation) जून में 3.9% पर स्थिर रही, लेकिन headline महंगाई का 4% का लक्ष्य पार करना बाजार की उम्मीदों के लिए महत्वपूर्ण है। ईंधन की ऊंची कीमतों का असर धीरे-धीरे अन्य वस्तुओं और सेवाओं के परिवहन और उत्पादन लागत पर भी पड़ता है। अब निवेशक और अर्थशास्त्री RBI की आगामी बैठकों पर नजर रखेंगे कि क्या बैंक अपनी मौजूदा मौद्रिक नीति को बनाए रखता है या ब्याज दरों में बदलाव पर विचार करता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर खाद्य और ऊर्जा की कीमतों में नरमी आती है, तो अक्टूबर से ब्याज दरों में बदलाव की संभावना पर विचार किया जा सकता है।

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