रोज़गार के मोर्चे पर मिली-जुली तस्वीर
भारत के लेबर मार्केट से जो ताज़ा आंकड़े आए हैं, वे धीरे-धीरे सुधार के संकेत दे रहे हैं। खासकर, अनएम्प्लॉयमेंट रेट में गिरावट और स्टेबल सैलरी वाली नौकरियों में बढ़त देखी गई है। लेकिन, ज़रा गहराई से देखने पर कुछ ऐसी जटिल आर्थिक समस्याएं सामने आती हैं, जैसे कि क्षेत्रीय असमानताएं और नॉमिनल (घोषित) कमाई तथा आम आदमी की खरीदने की क्षमता (रियल परचेजिंग पावर) के बीच का अंतर।
सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं?
पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के तहत जारी आंकड़ों के अनुसार, 15 साल और उससे ज़्यादा उम्र के पढ़े-लिखे लोगों में अनएम्प्लॉयमेंट रेट पिछले साल के 7.0% से घटकर 6.5% पर आ गया है। वहीं, रेगुलर वेज या सैलरी वाली एम्प्लॉयमेंट में काम करने वाले लोगों का हिस्सा 2024 के 22.4% से बढ़कर 23.6% हो गया है। इससे यह भी पता चलता है कि लोग सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट (खुद का काम) से हटकर दूसरों के लिए काम कर रहे हैं, जिसका हिस्सा घटकर 56.2% रह गया है। युवाओं ( 15-29 साल) में अनएम्प्लॉयमेंट भी मामूली घटकर 9.9% हो गया, जो पहले 10.3% था। इन बदलावों के साथ ही लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) 59.3% और वर्कर पॉप्युलेशन रेश्यो (WPR) 57.4% पर स्थिर रहा।
जीडीपी ग्रोथ के बावजूद सैलरी पर महंगाई की मार
भले ही आधिकारिक आंकड़े टाइट लेबर मार्केट की ओर इशारा कर रहे हों, लेकिन विकसित देशों के मुकाबले भारत में 6.5% का एजुकेटेड अनएम्प्लॉयमेंट रेट अभी भी काफी ज़्यादा है, जबकि विकसित देश 4% से नीचे का लक्ष्य रखते हैं। सैलरी वाली नौकरियों में यह बढ़त ऐसे समय में आई है, जब भारत की जीडीपी ग्रोथ 6-7% के आसपास बनी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में एम्प्लॉयमेंट बढ़कर 12.1% और सर्विसेज़ सेक्टर में 13.1% हो गया है। यह एग्रीकल्चर यानी खेतीबाड़ी सेक्टर के 43.0% से एक बड़ा बदलाव दिखाता है। यह बदलाव ग्लोबल इंडस्ट्रियलाइजेशन ट्रेंड्स के जैसा ही है।
हालांकि, यह सवाल उठता है कि नई सैलरी वाली नौकरियों की क्वालिटी कैसी है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, नॉमिनल वेज (घोषित सैलरी) में हुई बढ़ोतरी महंगाई की रफ्तार को नहीं पकड़ पाई है, जिससे लोगों की रियल वेज (असली खरीदने की शक्ति वाली सैलरी) में ठहराव आ गया है। 2025 में रेगुलर वेज एम्प्लॉयमेंट में पुरुषों की औसत मासिक कमाई बढ़कर ₹24,217 हुई, लेकिन महंगाई ने इस वैल्यू को कम कर दिया होगा। 2025 के लिए अनुमानित सैलरी हाइक्स लगभग 9.2% हैं, लेकिन चिंता यह है कि पिछले एक दशक में रियल वेज ग्रोथ बेहद कम रही है।
गांव-शहर की बढ़ती खाई और नौकरियों की क्वालिटी पर सवाल
रोज़गार की तस्वीर में जो अच्छी बातें दिख रही हैं, वे कुछ गंभीर समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर रही हैं। युवाओं में अनएम्प्लॉयमेंट 9.9% पर बना हुआ है, जो एक बड़ी चिंता है। 2025 में शहरी युवाओं में अनएम्प्लॉयमेंट 13.6% था, जो कि ग्रामीण दर 8.3% से काफी ज़्यादा है। यह साफ दिखाता है कि शहरों में युवाओं के लिए अवसरों की कमी है।
महिला लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) भले ही बढ़ा हो, लेकिन महिलाओं को अक्सर कम सैलरी वाली, इनफॉर्मल सेक्टर की नौकरियां या बिना पैसे वाली मदद वाली भूमिकाएं ही मिलती हैं। कुछ अर्थशास्त्री सर्वे के तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि ये आंकड़े शायद नौकरी न होने (joblessness) और कम रोज़गार (underemployment) को कम करके आंक रहे हैं, क्योंकि बहुत कम काम को भी रोज़गार गिना जा रहा है। रेगुलर सैलरी वाली नौकरियों में वृद्धि पर भी सवाल हैं; अगर कॉन्ट्रैक्ट्स अस्थिर हों या सैलरी जीवन-यापन के खर्चों के लायक न हो, तो यह असल आर्थिक प्रगति का संकेत नहीं माना जा सकता। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ के आंकड़े भी मिले-जुले रहे हैं, कुछ रिपोर्ट्स में धीरे-धीरे विस्तार या कुछ हिस्सों में गिरावट देखी गई है, जबकि सर्विसेज़ सेक्टर में लगातार वृद्धि हो रही है, जो हमेशा हाई-स्किल, हाई-वेज़ वाली नौकरियां नहीं बनाती।
महंगाई की चिंताएं, सैलरी ग्रोथ पर असर!
भारत के जॉब मार्केट के लिए आगे का अनुमान (outlook) मध्यम सैलरी ग्रोथ का है, जो 2026 के लिए लगभग 9% रहने का अनुमान है। हालांकि, बढ़ती महंगाई और नॉमिनल पे हाइक्स तथा रियल इनकम के बीच संभावित गैप की चिंताएं इस अनुमान को थोड़ा फीका कर रही हैं। अब ध्यान स्किल डेवलपमेंट (कौशल विकास) और शिक्षा को इंडस्ट्री की ज़रूरत के हिसाब से ढालने पर जा रहा है, खासकर ग्रीन एनर्जी और डिजिटल सर्विसेज़ जैसे क्षेत्रों में।