महंगाई के पीछे की कहानी
ऊपरी तौर पर महंगाई नियंत्रण में दिख रही है, लेकिन असल में कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। सरकार फिलहाल तेल की ऊंची कीमतों का बोझ खुद उठा रही है, जो भविष्य में उपभोक्ताओं के लिए एक बड़े प्राइस एडजस्टमेंट का कारण बन सकता है। वहीं, खराब मॉनसून की आशंका मौजूदा खाद्य महंगाई को और बढ़ा सकती है।
आंकड़ों पर एक नज़र
अप्रैल में खुदरा महंगाई दर 3.48% रही, जो मार्च के 3.40% की तुलना में थोड़ी ज्यादा है। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण कंज्यूमर फूड प्राइसेस में 4.2% का इजाफा रहा, जो पिछले महीने 3.87% था। हालांकि आलू और प्याज के दाम घटे, लेकिन टमाटर, फूलगोभी और नारियल जैसी चीज़ों के महंगे होने से खाद्य टोकरी (food basket) पर बोझ बढ़ा। 'रेस्टोरेंट और आवास सेवाओं' (Restaurants and accommodation services) में भी 4.20% की महंगाई दर्ज की गई।
ऊंचा ग्लोबल तेल और मॉनसून का खतरा
मध्य पूर्व में बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन के चलते एनर्जी मार्केट में लगातार तेजी बनी हुई है। मई में भारत के लिए क्रूड ऑयल का औसत दाम करीब $105 प्रति बैरल रहा, जो अप्रैल में $114 के स्तर को छूने के बाद है। फाइनेंशियल ईयर 26 की शुरुआत में यह $77 था। फिलहाल $100-$115 प्रति बैरल की कीमत भारत के लिए बड़ी चिंता का सबब है।
इस बीच, मॉनसून के औसत से कम रहने का अनुमान है, जिसमें बारिश सामान्य से करीब 92% रहने की उम्मीद है। 'सुपर एल नीनो' की संभावना कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति की स्थिरता पर और सवाल खड़े कर रही है।
दुनिया के मुकाबले भारत की स्थिति
अप्रैल में भारत की 3.48% की महंगाई दर वैश्विक रुझानों के मुकाबले थोड़ी बेहतर दिखती है। फरवरी में G20 देशों का औसत 3.7% था। चीन में महंगाई 1.2% रही, जबकि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में इसमें गिरावट आई। यह दिखाता है कि भारत अपनी घरेलू चुनौतियों के बावजूद महंगाई को काफी हद तक संभाले हुए है।
ऐतिहासिक तौर पर रहा है उतार-चढ़ाव
ऐतिहासिक रूप से, भारत की महंगाई दर में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है, जो 2012 से 2026 के बीच औसतन 5.60% रही है। पिछले खराब मॉनसून और एल नीनो की घटनाओं ने कृषि क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया था, जिससे फसलें खराब हुईं, खाद्य कीमतों में भारी उछाल आया और जीडीपी ग्रोथ धीमी हुई।
क्यों है तेल का इम्पोर्ट इतना अहम?
भारत अपनी 88-90% तेल की जरूरतों को इम्पोर्ट करता है, इसलिए यह वैश्विक कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील है। यह अनुमान लगाया गया है कि क्रूड ऑयल की कीमतों में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी करंट अकाउंट डेफिसिट को 35 बेस पॉइंट बढ़ा सकती है, महंगाई को 35-40 बेस पॉइंट तक ले जा सकती है और जीडीपी ग्रोथ को 20-25 बेस पॉइंट तक कम कर सकती है। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) ने 2026 में क्रूड ऑयल का औसत दाम $96 प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया है। कीमती धातुओं (precious metals) की बढ़ती कीमतें भी कोर इन्फ्लेशन में योगदान दे रही हैं।
सरकारी रणनीति और उसके जोखिम
सरकार कच्चे तेल के बढ़ते दामों का बोझ उपभोक्ताओं पर सीधे डालने के बजाय, इसे इम्प्लिसिट सब्सिडी के जरिए सोख रही है। यह रणनीति फिलहाल महंगाई को छुपा रही है, लेकिन भविष्य में एक बड़े और disruptive प्राइस एडजस्टमेंट का जोखिम बढ़ाती है। ऐसी खबरें हैं कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियां इस नीति के तहत रोजाना करीब ₹1,000 करोड़ का नुकसान झेल रही हैं। अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं कि तेल की ऊंची कीमतों का बोझ झेलना जीवन यापन की लागत को बढ़ाता है और सरकारी खजाने पर भारी पड़ता है।
मॉडरेट मॉनसून का खतरा
कमजोर मॉनसून और संभावित 'सुपर एल नीनो' की भविष्यवाणी भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करती है। अतीत में, खराब मॉनसून के कारण फसलें खराब हुई हैं, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ी है, ग्रामीण आय घटी है और उपभोक्ता मांग कमजोर हुई है।
कमजोर रुपया और RBI का रुख
भारत की तेल पर भारी निर्भरता और रुपये का कमजोर होना आयात लागत को और बढ़ा रहा है, जिससे महंगाई पर दबाव बढ़ रहा है।
हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) फिलहाल अपनी पॉलिसी दरों पर 'होल्ड' पर है, लेकिन संभावित तेल मूल्य वृद्धि और मॉनसून से उत्पन्न होने वाले खाद्य झटकों के कारण बढ़ती महंगाई RBI को अपनी नीतियों में बदलाव करने पर मजबूर कर सकती है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) अक्टूबर से ब्याज दरों में बढ़ोतरी (rate hikes) पर विचार कर सकती है।
आर्थिक पूर्वानुमान
आर्थिक पूर्वानुमानों के अनुसार, भारत में ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने भारत को 2026 और 2027 के लिए 6.5% जीडीपी ग्रोथ के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बताया है, और 2026 तक महंगाई 4.7% रहने का अनुमान लगाया है। गोल्डमैन सैक्स 2026 में 6.9% की मजबूत जीडीपी ग्रोथ और 3.9% महंगाई की उम्मीद कर रहा है। ADB का अनुमान है कि ऊंचे तेल की कीमतें FY27 में जीडीपी ग्रोथ को 0.6% तक कम कर सकती हैं और महंगाई को काफी बढ़ा सकती हैं। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी अपनी आगामी जून समीक्षा में 'वेट-एंड-वॉच' (wait-and-watch) रुख बनाए रखने की उम्मीद है, ताकि उभरते जोखिमों की निगरानी की जा सके।
