फिलहाल, भारत में महंगाई के मोर्चे पर जो सुकून दिख रहा था, वह अब छंटने लगा है। सरकारी उपायों से फ्यूल की कीमतों पर लगाम लगने से थोड़ी राहत मिली है, पर असली चिंता का सबब मौसम बन गया है।
खाने-पीने की चीजों पर मंडराता खतरा
मौसम विभाग (IMD) ने अगले मॉनसून पर 20 साल में सबसे निराशाजनक भविष्यवाणी की है। अल नीनो (El Niño) के असर से इस बार मॉनसून की बारिश में 10-15% की कमी आ सकती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब अल नीनो हावी रहा है, तब-तब सब्जियों के दाम 40-50% तक उछले हैं। हालांकि, सरकार के पास अनाज के भंडार होने से कीमतें थोड़ी संभाली जा सकती हैं, लेकिन फल और सब्जियों जैसे जल्दी खराब होने वाले उत्पादों की कीमतों में भारी इजाफा हो सकता है। इससे FY27 के लिए 4.6% की महंगाई दर के अनुमान को पार करने का बड़ा जोखिम है।
ग्रोथ पर भी दबाव
एक तरफ ये मौसम का संकट है, तो दूसरी ओर देश की इकोनॉमिक ग्रोथ पर भी दबाव गहरा रहा है। FY27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.0-6.25% कर दिया गया है। इसके पीछे ग्लोबल क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतें, ग्रामीण मांग में आई सुस्ती और राज्यों के फिस्कल स्ट्रेस जैसे कई कारण हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जो आमतौर पर ग्रोथ को सहारा देती है, अब कमजोर पड़ रही है। मॉनसून में खलल और सरकारी खर्च की कमी इसे और गंभीर बना सकती है। राज्यों पर फिस्कल दबाव इतना बढ़ गया है कि वे पब्लिक इन्वेस्टमेंट और खपत को कम कर सकते हैं। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने FY26 के लिए भारत की ग्रोथ 6.7% और वर्ल्ड बैंक ने FY27 के लिए 6.5% रहने का अनुमान जताया है, जो बताते हैं कि ग्रोथ मजबूत होने के बावजूद थोड़ी धीमी पड़ रही है।
पॉलिसी बदलने का रिस्क?
मार्केट्स को लग रहा है कि महंगाई काबू में है और RBI अपनी मॉनेटरी पॉलिसी को स्थिर रखेगी। पर वे एक बड़े जोखिम को नजरअंदाज कर रहे हैं - अचानक पॉलिसी बदलने की जरूरत पड़ सकती है। मौजूदा महंगाई के आंकड़े रेट हाइक का इशारा नहीं कर रहे, लेकिन अल नीनो के कारण अगर खाने-पीने की चीजों की कीमतें एकदम से बढ़ीं, तो RBI को मजबूरी में इंटरेस्ट रेट बढ़ाने पड़ सकते हैं। इतिहास में अल नीनो के कारण कीमतों और करेंसी में बड़ी गिरावट आई है, जिसके बाद ब्याज दरें बढ़ी हैं। वहीं, सरकार का फिस्कल डेफिसिट 5.5-5.8% से बढ़कर 8% तक पहुंच सकता है, जिससे इकोनॉमिक झटकों से निपटने की क्षमता सीमित हो जाएगी। कृषि पर भारत की निर्भरता के चलते, यह फूड-ड्रिवेन इन्फ्लेशन (खाद्य-आधारित महंगाई) के जोखिम को बढ़ाएगा, जिससे डेफिसिट बढ़ेगा और फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व पर भी दबाव आ सकता है। Nifty 50 इंडेक्स, जो फिलहाल 23x के ट्रेलिंग P/E पर ट्रेड कर रहा है, शायद इस बढ़ते जोखिम को अभी ठीक से आंक नहीं रहा। डॉलर के मुकाबले इंडियन रुपी 83 के स्तर पर है और साल के अंत तक 85-86 तक गिर सकता है, जिससे इंपोर्टेड इन्फ्लेशन (आयातित महंगाई) बढ़ेगी।
आगे क्या?
फिलहाल, RBI की पहली प्राथमिकता रेपो रेट को 6.5% पर बनाए रखना है। FY27 के लिए कोर इन्फ्लेशन 4.0-4.3% रहने का अनुमान है, जो RBI के कंफर्ट जोन में है। लेकिन, ये सब बाहरी कीमतों और मौसम के रुख पर टिका है। एनालिस्ट्स का मानना है कि तत्काल रेट हाइक की उम्मीद कम है, लेकिन मॉनसून की अपडेट्स भविष्य की पॉलिसी के लिए बहुत अहम होंगी। अगले कुछ समय में इंडियन रुपी 93-94 के दायरे में रह सकता है, जिसमें धीरे-धीरे गिरावट जारी रहने की आशंका है। कुल मिलाकर, भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ की रफ्तार तो मजबूत है, पर महंगाई और फिस्कल दबाव के इस खेल का नतीजा देखना बाकी है।