खाने-पीने की चीजों ने बढ़ाई महंगाई की चिंता
नए आंकड़ों के मुताबिक, मार्च महीने में कंज्यूमर फूड प्राइस इंडेक्स (CFPI) बढ़कर 3.87% पर पहुंच गया है। यह पिछले कुछ समय से कीमतों में आ रही गिरावट के विपरीत है। ग्रामीण इलाकों में महंगाई दर 3.63% रही, जबकि शहरी इलाकों में यह 3.11% पर थी। मौसमी फसलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन की दिक्कतों को इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण माना जा रहा है, खासकर टमाटर, प्याज और आलू जैसी जरूरी चीजें महंगी हुई हैं।
ऊर्जा संकट और RBI की चुनौती
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ घरेलू महंगाई बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ वैश्विक बाजार से आ रहे दबाव भी चिंताजनक हैं। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और मौसम संबंधी अनिश्चितताओं को लेकर आगाह किया है। मार्च 2026 में ब्रेंट क्रूड ऑयल की औसत कीमत $103 प्रति बैरल रही, जो पिछले महीने की तुलना में 60% ज्यादा है। शुरुआती अप्रैल तक यह $128 के करीब पहुंच गया। चूंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, इसलिए इससे करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ता है और भारतीय रुपये पर दबाव आता है। मार्च में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड ₹93.81 तक गिर गया था, और अप्रैल के मध्य तक यह ₹93.36 के करीब था, जो महीने भर में 1.19% कमजोर हुआ। हालांकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि अन्य इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसी की तुलना में रुपया बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने अप्रैल 2026 में रेपो रेट 5.25% पर अपरिवर्तित रखा है और न्यूट्रल स्टैंड (Neutral Stance) बनाए रखा है। इसका मकसद आर्थिक विकास को धीमा किए बिना महंगाई को काबू में रखना है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए आर्थिक विकास दर 6.9% रहने का अनुमान है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मुख्य जोखिम
हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत दिख रही है, लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं और बाहरी झटके जोखिम पैदा कर सकते हैं। कई इमर्जिंग मार्केट्स पहले से ही बढ़ती महंगाई और धीमी विकास दर से जूझ रहे हैं। FY27 के लिए भारत की महंगाई दर के अनुमानों को वर्ल्ड बैंक ने 4.9% और गोल्डमैन सैक्स ने 4.6% तक बढ़ाया है। यह इस चिंता को दर्शाता है कि ऊर्जा कीमतों में मौजूदा उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन की दिक्कतें 2026 के अंत तक बनी रह सकती हैं। महंगाई का असर भारतीय शेयर बाजारों जैसे सेंसेक्स और निफ्टी पर भी पड़ सकता है। हालांकि, मध्यम महंगाई से अक्सर अच्छे रिटर्न मिले हैं, लेकिन बहुत ज्यादा महंगाई कंपनियों के मुनाफे और निवेशकों के भरोसे को चोट पहुंचा सकती है। रुपये के ₹95 प्रति डॉलर तक कमजोर होने की भविष्यवाणियां भी हैं, जिससे आयातित महंगाई बढ़ सकती है। अगर इन पर ठीक से काबू नहीं पाया गया तो यह घरेलू कीमतों पर भी दबाव डाल सकता है।
महंगाई का भविष्य का अनुमान
आने वाले कुछ तिमाहियों में वैश्विक घटनाओं, ऊर्जा कीमतों और घरेलू सप्लाई से जुड़े मुद्दों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। RBI की ब्याज दरों को लेकर न्यूट्रल पॉलिसी उन्हें जरूरत पड़ने पर कदम उठाने की छूट देती है। मौजूदा अनुमानों के अनुसार, महंगाई RBI के लक्ष्य के दायरे में रहने की उम्मीद है। लेकिन, RBI द्वारा बताए गए जोखिमों और ऊंची कमोडिटी कीमतों की आशंका को देखते हुए सावधानी बरतना अभी भी जरूरी है। बाजार की नजरें मॉनसून के मौसम पर पड़ने वाले असर और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष पर भी रहेंगी।