फंड के असमान वितरण की चिंता
Crisil की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कंपनियों ने पिछले 10 सालों में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत ₹1.22 लाख करोड़ से ज़्यादा की रकम खर्च की है। यह खर्च 2020 से 2024 के बीच काफी तेज़ी से बढ़ा है। हालांकि, रिपोर्ट में एक बड़ी चिंता सामने आई है: CSR फंड का वितरण लगातार असमान बना हुआ है। खासकर 'एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स' (Aspirational Districts) यानी ऐसे ज़िले जिन्हें विकास की ज़्यादा ज़रूरत है, उन्हें बहुत कम फंड मिल रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2024 में, इस तरह के ज़रूरी इलाकों में केवल कुछ ही योग्य कंपनियों ने प्रोजेक्ट्स पर काम किया, और कुल CSR फंड का महज़ 12% ही इन क्षेत्रों में लगा।
NGOs का घटता रोल और डायरेक्ट एग्जीक्यूशन
इस असमानता के पीछे कई कारण हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कंपनियाँ अब CSR पहलों को सीधे अपने नियंत्रण में लेना पसंद कर रही हैं। पिछले पांच सालों में, नॉन-गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशंस (NGOs) जैसे बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता काफी कम हुई है।
NGOs की क्षमता और कॉर्पोरेट रणनीति
इस बदलाव के पीछे एक मुख्य वजह ग्रामीण इलाकों में सक्षम NGOs की कमी मानी जा रही है। मौजूदा कई एजेंसियां ऐसे प्रोजेक्ट्स को डिजाइन करने, लागू करने और उनके असर को मापने की ज़रूरी क्षमता से जूझ रही हैं। ऐसे में, कॉर्पोरेट कंपनियाँ अब अपनी इंटरनल टीमों में निवेश कर रही हैं या भरोसेमंद पार्टनर ऑर्गनाइजेशन्स के साथ मिलकर काम कर रही हैं।
नियमों में बदलाव की तैयारी
सरकार CSR नियमों को आसान बनाने पर विचार कर रही है। लोकसभा में 'कॉर्पोरेट लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026' पेश किया गया है। इस बिल का मकसद CSR एप्लीकेबिलिटी के लिए नेट प्रॉफिट थ्रेशोल्ड को बढ़ाना और खर्च न किए गए फंड को ट्रांसफर करने की समय-सीमा को बढ़ाना है। इन बदलावों के साथ-साथ ज़्यादा स्ट्रेटेजिक, डेटा-ड्रिवन कैपिटल एलोकेशन से लंबे समय में बेहतर नतीजे मिलने की उम्मीद है और यह भारत के 'विकसित भारत' बनने के लक्ष्य में मददगार साबित होगा।