कंपनियों ने क्यों बदला इन्वेस्टमेंट का तरीका?
यह बड़ा बदलाव दिखाता है कि कंपनियां अब फिक्स्ड-इनकम (Fixed-Income) इंस्ट्रूमेंट्स की ओर ज्यादा झुक रही हैं. इसकी कई वजहें हैं. ग्लोबल मार्केट के रुझान और भारत की मजबूत इकोनॉमी इसमें अहम भूमिका निभा रही हैं. भले ही कंपनियों की कमाई (Earnings) लगातार बढ़ रही थी, लेकिन उन्होंने इक्विटी (Equity) में अपना निवेश 62.25% तक कम कर दिया. इससे पता चलता है कि मौजूदा इकोनॉमिक माहौल में वे स्थिरता (Stability) और तय रिटर्न (Predictable Returns) को ज्यादा तरजीह दे रही हैं.
इंडेक्स में शामिल होने का बड़ा असर
FY25 में प्राइवेट कंपनियों ने बॉन्ड और डिबेंचर में रिकॉर्ड ₹35,981 करोड़ लगाए, जो FY24 में महज़ ₹224 करोड़ थे. वहीं, इक्विटी में निवेश 62.25% घटकर ₹59,945 करोड़ रह गया और म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) में ₹3,656 करोड़ का निवेश हुआ. JP Morgan के इंडेक्स में शामिल होने की घोषणा (जो FY24 के आखिर में हुई) और जून 2024 में इसके असल में शामिल होने के बाद से फॉरेन इन्वेस्टर्स (Foreign Investors) का पैसा भारत के बॉन्ड मार्केट में खूब आया. इसके बाद Bloomberg के बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने से भी तेजी को और बल मिला, जिससे बॉन्ड की कीमतें बढ़ीं. FY25 में कॉर्पोरेट बॉन्ड इश्यूएंस (Corporate Bond Issuances) बढ़कर ₹9.87 लाख करोड़ हो गए, जो पिछले साल ₹8.38 लाख करोड़ थे. इन बॉन्ड्स पर यील्ड (Yield) आमतौर पर 6.5% से 15% के बीच रही. यह इक्विटी के मुकाबले एक मजबूत विकल्प था, जहां Nifty 50 का इम्प्लाइड अर्निंग यील्ड जनवरी 2025 तक करीब 4.5% था.
बॉन्ड मार्केट की ग्रोथ और मुख्य कारण
भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट काफी बढ़ गया है. FY14 से FY25 के बीच नेट आउटस्टैंडिंग बॉन्ड्स (Net Outstanding Bonds) में करीब 12% का कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) देखा गया, और यह मार्च 2025 तक ₹53.6 ट्रिलियन तक पहुंच गया. FY25 में इश्यूएंस ने रिकॉर्ड तोड़ा, जो ₹9.9 ट्रिलियन के पार चला गया. कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) FY25 में 11.4% बढ़कर ₹1.21 ट्रिलियन हो गया. इसकी बड़ी वजह इंडेक्स में शामिल होना है, जिससे पैसिव इन्वेस्टमेंट (Passive Investment) के तौर पर बड़ी रकम आने की उम्मीद है. ये इनफ्लो (Inflows) बहुत जरूरी हैं, लेकिन इनसे वोलैटिलिटी (Volatility) भी आ सकती है. दिसंबर 2024 तक इंडिया-यूएस 10-यर बॉन्ड यील्ड स्प्रेड (Yield Spread) घटकर 227 बेसिस पॉइंट्स रह गया था, जो फॉरेन इन्वेस्टर्स के लिए एक अहम फैक्टर है. खासकर सर्विसेज सेक्टर (Services Sector) में दमदार परफॉरमेंस ने प्रॉफिट मार्जिन और रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) को बढ़ाया, जिससे बॉन्ड में ज्यादा निवेश को सपोर्ट मिला. एनालिस्ट्स का मानना है कि 2026 में इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) स्टेबल रहेंगे, जिससे शॉर्ट-टू-मीडियम टर्म बॉन्ड्स को फायदा होगा और बैंक लेंडिंग (Bank Lending) से मार्केट-बेस्ड फंडिंग की ओर मूवमेंट जारी रहेगा.
खतरे की घंटी और चिंताएं
इस मजबूत ग्रोथ के बावजूद, कुछ स्ट्रक्चरल कमजोरियां और रिस्क (Risks) चिंता का विषय हैं. कंपनियां एक्सटर्नल फंडिंग (External Funding) पर ज्यादा निर्भर हो रही हैं, जो FY25 में बढ़कर 53.6% हो गया, खासकर करंट लायबिलिटीज़ (Current Liabilities) से. यह शॉर्ट-टर्म कैश फ्लो (Cash Flow) में दिक्कतें पैदा कर सकता है. भले ही कमाई बढ़ी, लेकिन ऑपरेटिंग एक्सपेंसेस (Operating Expenses) भी बढ़े, जिससे कुछ सेक्टर्स में प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ा. कॉर्पोरेट बॉन्ड्स पर 6.5-15% की यील्ड रेंज क्रेडिट रिस्क (Credit Risk) में बड़े अंतर को दिखाती है. BBB रेटिंग से नीचे के बॉन्ड्स को अक्सर अन-इन्वेस्टिबल (Uninvestible) माना जाता है. Nomura द्वारा अपने इंडिया बॉन्ड ट्रेडिंग डेस्क पर प्रॉफिट इन्फ्लेशन (Profit Inflation) की जांच की खबरें भी मार्केट की इंटीग्रिटी (Market Integrity) पर सवाल उठाती हैं. फॉरेन कैपिटल, भले ही मददगार हो, ग्लोबल इकोनॉमिक बदलावों या करेंसी (Currency) के उतार-चढ़ाव के कारण तेजी से पलट सकती है. कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट बढ़ तो रहा है, लेकिन अभी भी डेवलप्ड देशों की तुलना में कुल फाइनेंसिंग का एक छोटा हिस्सा है.
कॉर्पोरेट बॉन्ड्स का भविष्य
FY26 में कॉर्पोरेट बॉन्ड इश्यूएंस करीब ₹11 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जो मार्केट की लगातार ग्रोथ को दिखाता है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का मार्केट डेवलपमेंट पर फोकस और चल रहे ग्लोबल इंडेक्स इनक्लूजन फॉरेन कैपिटल को और आकर्षित करेंगे. हालांकि एनालिस्ट्स 2026 में स्टेबल इंटरेस्ट रेट्स की उम्मीद कर रहे हैं, जो बॉन्ड इन्वेस्टमेंट के लिए अनुकूल है, लेकिन मार्केट ग्लोबल लिक्विडिटी (Global Liquidity) और डोमेस्टिक क्रेडिट रिस्क के प्रति संवेदनशील बना रहेगा.