ऊर्जा संकट से बढ़ी मुश्किलें, नई रणनीति की जरूरत
उद्योगों की ओर से समर्थन की मांग सिर्फ कीमतों में उछाल से कहीं बढ़कर है; यह एक गहरी रणनीतिक जरूरत का संकेत देती है। भारत का "गोल्डिलॉक्स मोमेंट" (Goldilocks moment) यानी कम इंफ्लेशन (Inflation) और हाई ग्रोथ (High Growth) के दौर से वर्तमान मुश्किल आर्थिक स्थिति में तेजी से बदलाव, भू-राजनीतिक तनावों की विनाशकारी शक्ति को दर्शाता है। इस झटके ने भारत को अपनी आर्थिक राह पर फिर से विचार करने और अधिक लचीलापन व आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए मजबूर किया है।
क्यों बढ़ रही हैं ऊर्जा की कीमतें?
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। मार्च 2026 तक ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) करीब $115 तक पहुंच गया था। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) जैसे प्रमुख सप्लाई रूट से संभावित रुकावटों के डर ने कीमतों को और भड़काया है। शुरुआती मार्च तक भारत के क्रूड ऑयल बास्केट की कीमत $80.16 प्रति बैरल दर्ज की गई। भारत अपनी करीब 90% क्रूड ऑयल की जरूरतों को आयात से पूरा करता है, इसलिए कीमतों में यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर देश के आयात बिल को बढ़ा रही है। वित्त मंत्रालय (Finance Ministry) का अनुमान है कि क्रूड ऑयल की हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल $12-15 अरब तक बढ़ सकता है।
आर्थिक अनुमानों पर छाया संकट
विश्लेषकों का अब भारत के लिए आर्थिक अनुमानों को लेकर नजरिया बदल रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY27) में जीडीपी (GDP) ग्रोथ घटकर 6.5% रह सकती है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) के अनुमानित 7.6% से कम है। यह अनुमान क्रूड ऑयल के औसतन $85 प्रति बैरल रहने की स्थिति पर आधारित है। वहीं, गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने ऊर्जा की ऊंची कीमतों और जारी ट्रेड रुकावटों के चलते 2026 के लिए ग्रोथ के अनुमान को घटाकर 5.9% कर दिया है। EY का अनुमान है कि अगर संघर्ष जारी रहा तो फाइनेंशियल ईयर 2027 में रियल जीडीपी ग्रोथ में 1% की कमी आ सकती है और सीपीआई इंफ्लेशन (CPI Inflation) में 1.5% की बढ़ोतरी हो सकती है। चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (Chief Economic Advisor) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि $90 प्रति बैरल तक की कीमतें ज्यादा असर नहीं डालेंगी, लेकिन अगर कीमतें $130 प्रति बैरल तक बनी रहीं तो इंफ्लेशन 5.5% तक जा सकती है और जीडीपी ग्रोथ घटकर 6.4% रह सकती है।
इस संकट का असर अब कई सेक्टर्स में दिख रहा है। कुछ रूट्स पर एयर फ्रेट (Air Freight) की दरें 30% से लेकर 250% तक बढ़ गई हैं, जिससे एक्सपोर्टर्स (Exporters), खासकर छोटे और मझोले उद्यमों (SMEs) को भारी नुकसान हो रहा है। लागत बढ़ने और ईंधन की समस्या के दोहरे झटके के कारण एक्सपोर्ट शिपमेंट में देरी हो रही है और इन्वेंटरी (Inventory) जमा हो रही है। खेती के लिए जरूरी फर्टिलाइजर (Fertilizer) सप्लाई भी चिंता का विषय है, खासकर ग्लोबल गैस सप्लाई में रुकावटों के कारण। हालांकि, आने वाले खरीफ सीजन के लिए यूरिया (Urea) का मौजूदा स्टॉक पर्याप्त माना जा रहा है, जो करीब 6.2 मिलियन टन उपलब्ध है।
इससे पहले भी कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने भारतीय बाजारों को प्रभावित किया है। जून 2014 में, बढ़ती क्रूड ऑयल कीमतों के कारण सेंसेक्स (Sensex) में बड़ी गिरावट आई थी। वर्तमान स्थिति इस कमजोरी को उजागर करती है, क्योंकि भारतीय रुपया (Indian Rupee) भी दबाव में है और कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflow) व बढ़ते इंपोर्ट कॉस्ट के कारण डॉलर के मुकाबले 95 के पार फिसल गया है। ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) का बढ़ना एक बड़ी चिंता है, CAD के फाइनेंशियल ईयर 2027 में जीडीपी के 1.7% तक पहुंचने का अनुमान है।
छिपे हुए जोखिम और एसएमई की चिंताएं
सरकारी आश्वासन और 2026 की शुरुआत के हालिया इंफ्लेशन आंकड़ों के अपेक्षाकृत स्थिर रहने के बावजूद, बड़े जोखिम बने हुए हैं। वित्त मंत्रालय ने यह भी कहा है कि $80 प्रति बैरल से ऊपर क्रूड ऑयल की लगातार कीमतें करंट अकाउंट डेफिसिट को बढ़ा सकती हैं और रुपये को कमजोर कर सकती हैं। भारत की ऊर्जा के लिए आयात पर भारी निर्भरता, जहां 90% से अधिक जरूरतें आयात से पूरी होती हैं, इसे बाहरी झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। यह मंदी के साथ बढ़ती कीमतों के दौर का जोखिम पैदा करता है। यह संकट पहले से मौजूद गहरी समस्याओं को और बढ़ाता है। छोटे और मझोले उद्यम (SMEs) बढ़ती लिक्विडिटी (Liquidity) की समस्या और टाइट वर्किंग कैपिटल (Working Capital) का सामना कर रहे हैं, जिससे बड़े कंपनियों से समय पर भुगतान मिलना उनके लिए बेहद जरूरी हो गया है। इंटरनेशनल एयर फ्रेट की बढ़ी हुई लागत और ग्लोबल एनर्जी की ऊंची कीमतों का बोझ इन व्यवसायों पर भारी पड़ रहा है, जिनमें से कई इस बढ़ी हुई लागत को आसानी से ग्राहकों पर नहीं डाल पा रहे हैं।
इसके अलावा, भारत की फर्टिलाइजर आयात के लिए मध्य पूर्व पर निर्भरता का मतलब है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कोई भी व्यवधान कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। हालांकि मौजूदा फर्टिलाइजर स्टॉक खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त लग रहे हैं, लेकिन लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष भविष्य में कमी और सब्सिडी लागत में वृद्धि का कारण बन सकता है। सरकार का एलपीजी (LPG) पर जोर, जो राजनीतिक रूप से लोकप्रिय है, फर्टिलाइजर, रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स जैसे उद्योगों पर दबाव डालता है।
आगे का रास्ता: राहत और आत्मनिर्भरता
इस बीच, कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) ने सप्लाई चेन (Supply Chain) को मजबूत करने के लिए साझेदारी के दृष्टिकोण पर जोर देते हुए सरकार की सतर्क प्रतिक्रिया की सराहना की है। इस रणनीति के मुख्य हिस्सों में सरकारी-से-सरकारी वार्ताओं के माध्यम से सप्लाई रूट का विविधीकरण (Diversification) और इथेनॉल (Ethanol) जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाना शामिल है।
यह संकट भारत की आत्मनिर्भरता को गति देने का अवसर भी प्रदान करता है, खासकर रक्षा निर्माण (Defense Manufacturing) के क्षेत्र में, मजबूत सप्लायर नेटवर्क बनाकर। सरकार के रणनीतिक कदम, जैसे ईंधन टैक्स (Fuel Tax) और एक्सपोर्ट ड्यूटी (Export Duty) को एडजस्ट करना, उपभोक्ताओं की सुरक्षा और घरेलू उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखते हैं। हालांकि, इन कदमों की दीर्घकालिक सफलता और भारत की आर्थिक मजबूती वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चल रही अस्थिरता को प्रबंधित करने और इस झटके से उजागर हुई गहरी समस्याओं को ठीक करने पर निर्भर करेगी।