भारतीय कंपनियों में निवेश का संशय
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़ी पहेली का सामना कर रही है। एक ओर जहाँ कई प्रमुख कंपनियां शानदार मुनाफे (strong profits) की रिपोर्ट कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर नए प्रोजेक्ट्स में प्राइवेट कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) यानी निजी पूंजीगत व्यय में भारी कमी देखी जा रही है। यह स्थिति फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण सहित सरकारी अधिकारियों और उद्योग जगत के नेताओं के लिए चिंता का विषय बन गई है।
RPG ग्रुप के चेयरमैन हर्ष गोएंका ने इस 'निवेश की सुस्ती' के पीछे सात बड़ी वजहें बताई हैं। उन्होंने कहा कि ये कारक मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जहाँ कंपनियां बड़ा निवेश करने से कतरा रही हैं।
प्रमुख अड़चनें क्या हैं?
- पॉलिसी और टैक्स की अनिश्चितता: कंपनियों को सरकारी नीतियों और टैक्सेज (taxes) को लेकर लगातार अनिश्चितता का डर सता रहा है। खासकर, पिछली कुछ नीतियों को पीछे की तारीख से (retroactively) लागू करने के अनुभवों ने कंपनियों को भविष्य के बारे में सोचने पर मजबूर किया है।
- रेगुलेटरी चिंताएं: अप्रत्याशित रेगुलेटरी (regulatory) कार्रवाइयों का डर भी निवेश के फैसलों को प्रभावित कर रहा है। व्यवसायों को यह विश्वास चाहिए कि उनके निवेश पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।
- डिमांड का अनिश्चित आउटलुक: भविष्य में कस्टमर डिमांड (customer demand) कैसी रहेगी, इसे लेकर अनिश्चितता ने कंपनियों की बड़ी पूंजी लगाने की हिम्मत कम कर दी है।
- बदलते निवेश के तौर-तरीके: आजकल कई नई कंपनियां और स्टार्ट-अप्स (startups) एसेट-लाइट मॉडल्स (asset-light models) को अपना रहे हैं। वे फैक्ट्री लगाने जैसे भारी-भरकम निवेश के बजाय सर्विस या टेक्नोलॉजी पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
- वैश्विक फोकस: घरेलू जोखिमों से बचने के लिए, कुछ फर्में अब भारत के बजाय दूसरे देशों में निवेश को प्राथमिकता दे रही हैं।
- पीढ़ीगत बदलाव: हर्ष गोएंका ने यह भी बताया कि कई पारिवारिक व्यवसायों में युवा पीढ़ी अब इंडस्ट्री बढ़ाने के बजाय पैसिव इन्वेस्टमेंट (passive investments) या फैमिली ऑफिस (family offices) को मैनेज करने में अधिक दिलचस्पी दिखा रही है।
- लंबे अप्रूवल प्रोसेस: इसके अतिरिक्त, किसी भी प्रोजेक्ट के लिए लंबे लीगल और अप्रूवल प्रोसेस (approval processes) भी देरी का कारण बनते हैं, जो कंपनियों की अनिच्छा को और बढ़ाते हैं।
