बोर्डरूम में बड़ा उछाल, पर एग्जीक्यूटिव रोल्स में धीमी रफ्तार
भारतीय कंपनियों के बोर्ड में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में पिछले कुछ सालों में काफी इजाफा हुआ है। 2017 में जहां यह 25.8% था, वहीं 2025 तक बढ़कर 29.1% हो गया है। कुल मिलाकर बोर्ड की एक मिलियन से ज्यादा सीटों पर अब महिलाएं काबिज हैं। यह बड़ी वृद्धि मुख्य रूप से रेगुलेटरी (नियामकीय) मंडेट्स और कॉर्पोरेट डाइवर्सिटी (विविधता) लक्ष्यों के कारण हुई है।
लेकिन, बोर्ड में यह सफलता एग्जीक्यूटिव (कार्यकारी) पदों तक पूरी तरह से नहीं पहुंच पाई है। सीनियर मैनेजमेंट में महिलाओं की हिस्सेदारी में बहुत धीमी प्रगति देखी गई है, जो 2017 में 13.6% से बढ़कर 2025 में मात्र 17.1% हुई है। यह गैप स्पष्ट रूप से दिखाता है कि बोर्ड में जगह मिलने के बावजूद, दैनिक एग्जीक्यूटिव फैसलों में उनका प्रभाव सीमित है, जो टॉप लीडरशिप (नेतृत्व) के लिए एक 'ग्लास सीलिंग' (पारदर्शी बाधा) की ओर इशारा करता है।
मिडिल मैनेजमेंट में ग्रोथ, पर टॉप तक नहीं
कुल मैनेजमेंट के स्तर पर, महिलाओं की हिस्सेदारी में मजबूत ग्रोथ देखी गई है। यह 2017 से दोगुनी से भी ज्यादा होकर अब 29.6% पर पहुंच गई है। यह निचले और मिडिल मैनेजमेंट में एक मजबूत पाइपलाइन का संकेत देता है। हालांकि, इन पदों से टॉप एग्जीक्यूटिव रैंक तक पहुंचने में कई सिस्टमैटिक (व्यवस्थित) बाधाएं मौजूद हैं। स्टडीज बताती हैं कि एंट्री-लेवल से मैनेजमेंट तक पुरुषों को महिलाओं से दोगुने से भी ज्यादा की दर पर प्रमोट (पदोन्नत) किया जाता है, और यह गैप ऊपर के स्तरों पर भी बना रहता है।
इसके अलावा, महिलाएं अक्सर HR या कम्युनिकेशन जैसे सपोर्ट फंक्शन (सहायक कार्यों) में अधिक केंद्रित रहती हैं, न कि सीधे रेवेन्यू-ड्राइविंग (राजस्व-संचालित) या स्ट्रेटेजिक (रणनीतिक) रोल्स में। इससे उन्हें प्रमुख प्रॉफिट-एंड-लॉस (मुनाफे-नुकसान) से जुड़ी जिम्मेदारियों का अनुभव कम मिलता है, जो एग्जीक्यूटिव प्रमोशन के लिए जरूरी है।
टोकन बोर्ड सीट बनाम असली एग्जीक्यूटिव रोल
बोर्ड रिप्रेजेंटेशन (प्रतिनिधित्व) के आंकड़े ऊपरी तौर पर भले ही मजबूत दिखें, लेकिन विश्लेषण से पता चलता है कि कई महिला डायरेक्टर्स 'टोकन' पोजिशन्स (प्रतीकात्मक पद) पर हैं। BSE-200 कंपनियों के बोर्ड में 65% पुरुषों की तुलना में केवल 11% महिलाओं के पास एग्जीक्यूटिव रोल्स हैं। यह दर्शाता है कि कंप्लायंस (अनुपालन) के लिए उपस्थिति को महत्व दिया जाता है, न कि वास्तविक प्रभाव को।
CEO जैसे लीडरशिप रोल्स में महिलाओं का पहुंचना अभी भी बहुत धीमा है; भारत की कंपनियों में केवल 5-6% CEO पद महिलाओं के पास हैं। दुनियाभर में, लीडरशिप में अधिक जेंडर डाइवर्सिटी वाली कंपनियां अक्सर बेहतर फाइनेंशियल परफॉर्मेंस दिखाती हैं, जिसमें ज़्यादा प्रॉफिट और स्टॉक रिटर्न शामिल हैं। भारत की वर्तमान राह, भले ही धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हो, टॉप निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में जेंडर इक्वलिटी (समानता) के पूर्ण आर्थिक लाभों से चूक रही है।
ढांचागत और सांस्कृतिक बाधाएं प्रगति को धीमा कर रही हैं
सीनियर मैनेजमेंट में लगातार बनी 'ग्लास सीलिंग' कोई आकस्मिक बात नहीं है, बल्कि यह गहरी ढांचागत (स्ट्रक्चरल) और सांस्कृतिक (कल्चरल) बाधाओं का संकेत है। जेंडर स्टीरियोटाइप्स (लैंगिक रूढ़िवादिता) और अनकॉन्शियस बायस (अचेतन पूर्वाग्रह) अभी भी प्रमोशन और परफॉरमेंस रिव्यू (प्रदर्शन समीक्षा) को प्रभावित करते हैं, और अक्सर पारंपरिक लीडरशिप स्टाइल्स को प्राथमिकता दी जाती है।
वर्क-लाइफ बैलेंस (कार्य-जीवन संतुलन) की चुनौतियां, खासकर महिलाओं द्वारा उठाए जाने वाले अनपेड केयर वर्क (अवैतनिक देखभाल कार्य) के भारी बोझ के कारण, करियर की प्रगति में बड़ी बाधाएं पैदा करती हैं। महिलाओं के लिए स्पॉन्सरशिप (प्रायोजन) और विजिबिलिटी (दृश्यता) की भी कमी है, जिससे वे अक्सर की (महत्वपूर्ण) टास्क या सीनियर चर्चाओं से बाहर महसूस करती हैं।
DEI (डाइवर्सिटी, इक्विटी, इंक्लूजन) के कंपनी लक्ष्यों के बावजूद, उनका निष्पादन (एग्जीक्यूशन) अक्सर कमतर रहता है। लगभग दो-तिहाई फर्मों ने महिला Key Managerial Personnel (KMP) की कमी बताई है, जो कंपनी संचालन के लिए महत्वपूर्ण एग्जीक्यूटिव पद होते हैं। लीडरशिप में इस तरह के वास्तविक प्रतिनिधित्व की कमी निवेशकों के लिए एक ESG (एनवायर्नमेंटल, सोशल, गवर्नेंस) रिस्क (जोखिम) पैदा करती है, क्योंकि वे कंपनी के मूल्य और प्रतिस्पर्धात्मकता पर इसके प्रभाव के लिए डाइवर्सिटी डेटा की जांच कर रहे हैं।
वास्तविक एग्जीक्यूटिव प्रभाव के लिए राह
हालांकि भारत के रेगुलेशन ने बोर्ड में महिलाओं की संख्या बढ़ाई है, लेकिन अब फोकस एग्जीक्यूटिव रोल्स में वास्तविक प्रभाव और साझा शक्ति को बढ़ावा देने पर होना चाहिए। उभरते ट्रेंड्स बताते हैं कि जिन कंपनियों में महिलाओं के पास लीडरशिप पोजिशन्स (जैसे CEO या बोर्ड चेयरपर्सन) हैं, वहां अक्सर ओवरऑल बोर्ड डाइवर्सिटी भी अधिक होती है।
लेकिन, कंपनी कल्चर, प्रमोशन सिस्टम और लीडरशिप एकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) में बड़े बदलावों के बिना, वर्तमान प्रगति को देखते हुए सीनियर लीडरशिप में पूर्ण जेंडर इक्वलिटी (समानता) प्राप्त करने में दशकों लग सकते हैं। इंडिया इंक. के सामने सिम्बॉलिक (प्रतीकात्मक) उपस्थिति से आगे बढ़कर ऐसे माहौल बनाने की चुनौती है, जहाँ महिलाएं निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में आगे बढ़ सकें और सफल हो सकें, जिससे उनकी पूरी क्षमता और उससे जुड़े फाइनेंशियल फायदे (वित्तीय लाभ) का उपयोग हो सके।
