इस समय बाजार में AI को लेकर जो चर्चाएं हो रही हैं, वे भारत की IT सर्विसेज इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी चुनौती मानी जा रही हैं। इसी डर के चलते कई इंटरनेशनल फंड्स ने इंडिया, खासकर IT शेयरों में अपना निवेश कम कर दिया है। लेकिन, क्या AI का खतरा इतना बड़ा है, या फिर यह सिर्फ एक नैरेटिव है जो दूसरे बड़े मौकों को छुपा रहा है?
Kotak Institutional Equities के Pratik Gupta बताते हैं कि MSCI India इंडेक्स में भारत की वेटेज में आई कमी इसी ओर इशारा करती है कि ग्लोबल निवेशक भारत को लेकर 'अंडरवेट' (Underweight) हो गए हैं। यह डर इस बात से उपजा है कि AI की वजह से बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म हो सकती हैं और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है। हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि AI टूल्स जितनी तेजी से आ रहे हैं, उनका असली इस्तेमाल और कंपनियों में उनका इंटीग्रेशन (Integration) एक लंबी प्रक्रिया है, ठीक वैसे ही जैसे क्लाउड टेक्नोलॉजी को अपनाने में कई साल लगे थे। इस समय मार्केट AI के सबसे बुरे नतीजों को मानकर चल रहा है, जो शायद उतना गंभीर न हो।
अगर वैल्यूएशन की बात करें, तो Nifty IT इंडेक्स का P/E रेशियो करीब 21.4x पर है, जो पिछले 3 साल के औसत 27.4x से काफी कम है। TCS और Infosys जैसी बड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन भी ऐतिहासिक औसत से नीचे चल रहे हैं। यह दर्शाता है कि मार्केट पहले से ही AI इंटीग्रेशन के लिए होने वाले भारी R&D खर्च और मार्जिन पर पड़ने वाले संभावित दबाव को प्राइस-इन (Price-in) कर चुका है।
वहीं, रेगुलेटरी (Regulatory) मोर्चे पर, भारत AI गवर्नेंस को लेकर सक्रिय रूप से काम कर रहा है। IT रूल्स, 2021 में किए गए संशोधन, जो फरवरी 2026 से लागू होंगे, AI-जनरेटेड कंटेंट को इंटरमीडियरी गाइडलाइंस के दायरे में लाएंगे। सरकार का रवैया इंडस्ट्री के सेल्फ-रेगुलेशन (Self-regulation) पर जोर देने का है, जो AI को अपनाने में बड़ी बाधा नहीं बनता।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि IT सेक्टर में यह डर कहीं न कहीं भारत के बाकी मजबूत सेक्टर्स को नजरअंदाज करवा रहा है। कई सोवरन वेल्थ फंड्स (Sovereign Wealth Funds) और ग्लोबल लॉन्ग-ओनली इन्वेस्टर्स (Global Long-Only Investors) बैंकिंग, NBFCs, हेल्थकेयर, टेलीकॉम और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में बेहतरीन मौके तलाश रहे हैं। IT सेक्टर पर AI के डर से भारत में कम निवेश करना, इन दूसरे बढ़ते सेक्टर्स के लाभ से चूकने का जोखिम पैदा करता है।
भारतीय IT सेक्टर ने हमेशा मुश्किलों का सामना कर खुद को साबित किया है। भले ही Nifty IT इंडेक्स ने पिछले एक साल में -21.69% का करेक्शन (Correction) देखा हो, जो 2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद सबसे बड़ी गिरावट है, लेकिन ऐसे करेक्शन अक्सर नए मौके भी लाते हैं। IT सेक्टर का मुनाफा ऐतिहासिक रूप से बढ़ा है, और AI एक नई चुनौती है, पर इंडस्ट्री हमेशा ऐसे बदलावों के साथ खुद को ढालती रही है।
हालांकि, यह भी सच है कि AI का सीधा असर पारंपरिक एप्लीकेशन सर्विसेज (Application Services) सेगमेंट पर पड़ सकता है, जिससे प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और प्रॉफिटेबिलिटी कम हो सकती है। यह एक बड़ा सवाल है कि मौजूदा IT कंपनियां कितनी तेजी से खुद को बदल पाती हैं और अपने कर्मचारियों को री-ट्रेन (Re-train) कर पाती हैं। फॉरेन इन्वेस्टर्स ने 2025 में रिकॉर्ड $8.5 बिलियन के IT शेयर बेचे हैं, जो इन स्ट्रक्चरल शिफ्ट्स (Structural Shifts) को लेकर उनके भरोसे में आई कमी को दिखाता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, AI अगले चार सालों में इंडस्ट्री के रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा खत्म कर सकता है।
कुल मिलाकर, मौजूदा मार्केट सेंटिमेंट (Market Sentiment) एक तरफा डर की ओर झुका हुआ है, जिससे यह Pessimism (निराशा) खुद ही ओवरवैल्यूड (Overvalued) हो सकता है। AI का असर बड़ा होगा, लेकिन भारतीय IT फर्म्स के लॉन्ग-टर्म सर्वाइवल (Long-term Survival) पर इसका तत्काल खतरा उतना ज्यादा नहीं है जितना मार्केट रिएक्शन दिखा रहा है। AI का एंटरप्राइज-वाइड इंटीग्रेशन (Enterprise-wide Integration) एक मल्टी-ईयर प्रोसेस (Multi-year Process) होगा। ऐसे में, जो निवेशक सिर्फ IT सेक्टर में AI के डर से भारत में कम निवेश कर रहे हैं, वे बैंकिंग, मैन्युफैक्चरिंग और अन्य सेक्टर्स में आने वाली तेजी से चूक सकते हैं। कहानी अब क्वार्टरली रिजल्ट्स से आगे बढ़कर लॉन्ग-टर्म बिजनेस मॉडल्स की हो गई है, और जो कंपनियां इस बदलाव में सफल होंगी, वे और मजबूत बनकर उभरेंगी। यह डर ही कंट्रेरियन (Contrarian) निवेशकों के लिए एक अच्छा एंट्री पॉइंट (Entry Point) बना सकता है।