India Household Debt: ₹17.32 लाख करोड़ का बोझ! बढ़ रहा खर्च, लेकिन EMI का चक्कर भारी

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Household Debt: ₹17.32 लाख करोड़ का बोझ! बढ़ रहा खर्च, लेकिन EMI का चक्कर भारी

भारत में लोगों का खर्च भले ही बढ़ रहा हो और यह जीडीपी का लगभग **60%** हो गया हो, लेकिन पर्सनल लोन पर बढ़ती निर्भरता ने कुल कर्ज़ को **₹17.32 लाख करोड़** तक पहुंचा दिया है। यह दिखाता है कि लोग भले ही अपनी ज़रूरतों पर ज़्यादा खर्च कर रहे हैं, लेकिन भविष्य के बड़े फाइनेंशियल लक्ष्यों को लागत बढ़ने के कारण टाल रहे हैं।

Detailed Coverage

खर्च में उछाल, पर बजट का संतुलन बिगड़ा?

भारत में उपभोक्ता खर्च (Consumer Spending) एक अहम मुकाम पर पहुंच गया है, जो अब देश की कुल आर्थिक उत्पादन का करीब 60% है। साल 2023-24 के हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में हर व्यक्ति की औसत मासिक खर्च 9.3% और शहरी इलाकों में 8.3% बढ़ी है। जैसे-जैसे लोगों की आमदनी बढ़ी है, खाने-पीने जैसी बुनियादी चीज़ों पर खर्च का हिस्सा ग्रामीण घरों में 47% और शहरी घरों में 40% तक गिर गया है। इसकी वजह से अब परिवार यात्रा, मनोरंजन और प्रोसेस्ड फूड जैसी गैर-ज़रूरी चीज़ों पर ज़्यादा पैसा लगा पा रहे हैं।

बदलती प्राथमिकताएं: लग्जरी या जरूरत?

भारतीय परिवारों के बजट की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जहां ग्रामीण खर्च चिकित्सा और परिवहन की ओर बढ़ रहा है, वहीं शहरी परिवार सर्विस, रेंटल प्रॉपर्टी और लाइफस्टाइल से जुड़े खर्चों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि लोग सुविधा और अनुभवों को ज़्यादा अहमियत दे रहे हैं। हालांकि, यह सब तब हो रहा है जब बड़े शहरों में महंगाई लगातार बढ़ रही है।

कर्ज़ का बढ़ता जाल

खर्च भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन इसे पूरा करने के लिए कर्ज़ का सहारा लिया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट बताती है कि पर्सनल लोन में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। 2019 में जहां यह ₹5.53 लाख करोड़ था, वहीं 2026 तक इसके ₹17.32 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें ईएमआई (EMI) और 'अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें' (Buy Now Pay Later) जैसी सुविधाओं का बड़ा हाथ है। क्रेडिट की इसी आसानी ने कई परिवारों का ध्यान लंबी अवधि की बचत से हटाकर छोटी अवधि की ईएमआई चुकाने की क्षमता पर केंद्रित कर दिया है।

वित्तीय अस्थिरता का खतरा

बढ़ते खर्च के बावजूद, कई युवा आज के समय में आर्थिक चिंता महसूस कर रहे हैं। डेलॉइट (Deloitte) के आंकड़ों के अनुसार, जेन ज़ेड (Gen Z) और मिलेनियल्स (Millennials) का एक बड़ा वर्ग घर खरीदने जैसे बड़े फैसले टाल रहा है, क्योंकि प्रॉपर्टी की कीमतें अक्सर सैलरी ग्रोथ से तेज़ी से बढ़ी हैं। गैर-ज़रूरी चीज़ों पर कर्ज़ पर निर्भरता भविष्य में परिवारों की बैलेंस शीट के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है, खासकर अगर आमदनी बढ़ने की रफ्तार कर्ज़ चुकाने की लागत से पीछे रह जाती है। जो निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था पर नज़र रख रहे हैं, उन्हें RBI की रिटेल क्रेडिट क्वालिटी और नॉन-हाउसिंग लोन ग्रोथ पर आने वाली रिपोर्ट्स पर ध्यान देना चाहिए। ये रिपोर्ट्स बताएंगी कि क्या खर्च का यह ट्रेंड टिकाऊ है या फिर यह परिवारों पर वित्तीय दबाव बढ़ाएगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.