क्या है सरकार का नया कदम?
सरकार के इस फैसले से सोने, चांदी और प्लैटिनम के इंपोर्ट पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 6% से बढ़कर 15% हो गई है। यह एक बड़ा कदम है क्योंकि कुछ समय पहले ही बजट में इसे घटाकर 6% किया गया था। इस बढ़ोतरी का सीधा मकसद देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को मजबूत करना है, जो आजकल कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और शिपिंग रूट में आ रही दिक्कतों के चलते दबाव में है।
इंपोर्ट महंगा क्यों हुआ?
आर्थिक जानकारों की मानें तो यह फैसला कई वजहों से लिया गया है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें $85 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं और $90-$100 तक जाने की आशंका है। साथ ही, पश्चिम एशिया में शिपिंग रूटों में आ रही बाधाओं के कारण भी इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ रही है। ऐसे में सरकार अपनी कीमती विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल कच्चे तेल, उर्वरक, डिफेंस इक्विपमेंट और कैपिटल गुड्स जैसी जरूरी चीजों के इंपोर्ट के लिए करना चाहती है। सोने-चांदी जैसे कीमती धातुओं का इंपोर्ट, जो ज्यादातर कंज्यूमर और इन्वेस्टमेंट डिमांड से जुड़ा है, अब फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव डाल रहा है।
आर्थिक जोखिम और ग्राहकों पर असर
इस पॉलिसी में अचानक बदलाव यह दर्शाता है कि सरकार ग्रोथ को बढ़ावा देने के बजाय अभी आर्थिक जोखिमों को संभालने को ज्यादा प्राथमिकता दे रही है। यह एक तरह से ग्लोबल अस्थिरता के प्रति भारत की बढ़ती संवेदनशीलता को भी दिखाता है। अमेरिका जैसे खुले बाजारों के उलट, भारत और चीन जैसे देश आर्थिक दबाव झेलने के लिए इंपोर्ट कंट्रोल जैसे तरीके अपनाते हैं। हालांकि, ऐसे कदम कंज्यूमर खर्च को कम कर सकते हैं। खासकर सोने पर ड्यूटी का इतना बड़ा हाइक, जो भारत में एक महत्वपूर्ण निवेश और सांस्कृतिक संपत्ति है, लोगों के डिस्क्रिशनरी खर्च को सीमित कर सकता है और संबंधित उद्योगों पर भी असर डाल सकता है।
आगे क्या होगा?
सरकार का यह कदम बताता है कि वह सीधे बैन लगाने के बजाय ड्यूटी बढ़ाकर विदेशी मुद्रा के आउटफ्लो को कंट्रोल करना चाहती है। यह आर्थिक स्थिरता और ग्रोथ के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतें और ग्लोबल जियो-पॉलिटिकल रिस्क अभी भी बड़ा फैक्टर बने हुए हैं। भारत में कीमती धातुओं का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि यह ड्यूटी हाइक डिमांड को कितना कम कर पाता है और सरकार आगे इन बाहरी आर्थिक चुनौतियों से कैसे निपटती है।
