क्यों बढ़े दाम? वैश्विक तेल संकट का असर
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल (Crude Oil) $100 प्रति बैरल के पार बना हुआ है, खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते मतभेदों के चलते। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास आपूर्ति में आई बाधाओं ने ब्रेंट क्रूड को करीब $107 प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है। भारत, जो अपनी तेल ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इस कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और गिरते रुपये से सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है। तेल कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान की भरपाई के लिए यह कदम उठाया गया है।
आम आदमी पर सीधा असर
इस बढ़ोतरी का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। दिल्ली में अब पेट्रोल ₹97.77 प्रति लीटर और डीजल ₹90.67 प्रति लीटर मिलेगा। इस बढ़ी हुई लागत का भार यात्रियों और वाणिज्यिक वाहन चालकों पर आएगा, जिसके चलते ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने किराए में बढ़ोतरी की मांग शुरू कर दी है।
महंगाई का डबल अटैक!
यह मूल्य वृद्धि पहले से ही बढ़ी हुई महंगाई को और भड़का सकती है। अप्रैल 2026 में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पहले से ही 8.3% था, जिसमें ईंधन और बिजली की महंगाई 24.71% पर थी। खुदरा महंगाई (CPI) भी अप्रैल में 3.48% थी। विश्लेषकों का अनुमान है कि मई में CPI बढ़कर 4.1% और WPI 9% को पार कर सकता है। इतिहास गवाह है कि ईंधन की कीमतें बढ़ने से खाने-पीने की चीज़ों और अन्य ज़रूरी सामानों के दाम भी बढ़ते हैं, जिससे निम्न-आय वर्ग के परिवारों पर सबसे ज़्यादा बोझ पड़ता है। इससे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को अपनी ब्याज दरों को लेकर सख़्त रुख अपनाना पड़ सकता है।
सरकारी खजाने पर बोझ
सरकार पर भी राजकोषीय दबाव बढ़ गया है। 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) का लक्ष्य GDP का 4.3% रखा गया है। लेकिन, सब्सिडी भुगतान (खासकर उर्वरकों पर ₹2 लाख करोड़ से ज़्यादा) और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के भारी नुकसान को देखते हुए, यह घाटा बढ़ने की पूरी संभावना है। गिरता हुआ रुपया आयात बिल को बढ़ा रहा है, जिससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आ रहा है। यह स्थिति प्रधानमंत्री मोदी के 'स्वैच्छिक संयम' और ईंधन संरक्षण के हालिया आह्वान के विपरीत है।
आर्थिक गतिविधियों पर असर
भारत की आर्थिक ग्रोथ के लिए अहम लॉजिस्टिक्स सेक्टर को भी अब बढ़े हुए परिचालन लागत का सामना करना पड़ेगा। इन बढ़ी हुई लागतों को अंततः उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा, जिससे कुल मांग कम हो सकती है और उत्पादन धीमा पड़ सकता है। आगे चलकर, सरकार को ऊर्जा बाज़ारों की अनिश्चितता के बीच राजकोषीय लक्ष्यों, महंगाई नियंत्रण और आर्थिक विकास को संतुलित करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।