रेमिटेंस का ऐसा प्रवाह जो देश की अर्थव्यवस्था को दे रहा है सहारा!
भारत को 2024 में $137.67 अरब का रेमिटेंस मिला है, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 3.5% है। यह रकम मेक्सिको जैसे देशों के मुकाबले दोगुनी से भी ज़्यादा है, जिसने $64.7 अरब प्राप्त किए। यह इनफ्लो भारत के ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) को लगभग 40-45% तक कवर करता है, जिससे देश की वित्तीय स्थिति को ज़बरदस्त स्थिरता मिलती है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में, करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) घटकर जीडीपी का मात्र 0.7% रह गया, जिसका एक बड़ा श्रेय प्राइवेट ट्रांसफर (मुख्य रूप से रेमिटेंस) में आई 11.9% की बढ़ोतरी को जाता है। अनुमान है कि FY2026 तक यह डेफिसिट 1.1-1.2% जीडीपी के आसपास रहेगा।
स्रोत बदले, पर मजबूती बढ़ी
रेमिटेंस के स्रोत भी बदल रहे हैं। पहले जहां गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों से आने वाला पैसा 47% (2016-17) था, वहीं अब यह घटकर लगभग 38% (2023-24) रह गया है। इसके उलट, डेवलप्ड देशों (Developed Countries) से आने वाले फंड का हिस्सा 30% से बढ़कर करीब 42% हो गया है, जिसमें अकेले अमेरिका का योगदान 27.7% है। तेल की कीमतों से कम जुड़े इन स्थिर स्रोतों में बदलाव से भारत का रेमिटेंस फ्लो अब बाहरी झटकों के प्रति ज़्यादा मज़बूत हो गया है।
डायस्पोरा का टैलेंट भी आ रहा भारत
सिर्फ पैसा ही नहीं, भारतीय डायस्पोरा (Diaspora) देश के टेक्नोलॉजी सेक्टर की ग्रोथ में भी अहम भूमिका निभा रहा है। भारत 'ब्रेन-गेन' (Brain Gain) की रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत दुनिया भर के कुशल पेशेवरों और उद्यमियों को वापस लौटने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये लोग स्टार्टअप्स को मेंटरशिप दे रहे हैं और भारत में निवेश कर रहे हैं, जिससे 'ब्रेन ड्रेन' (Brain Drain) का नुकसान टैलेंट और विशेषज्ञता के फायदे में बदल रहा है।
रुपया, फिनटेक और फॉरेक्स पर असर
भारतीय रुपया (INR) 2024 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 83.679 के स्तर पर कमजोर हुआ है, और आगे भी गिरावट की आशंका है। इसका एक कारण अमेरिका द्वारा इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) बढ़ाना भी है, जो इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) से निवेश को खींच सकता है। हालांकि, रेमिटेंस इनफ्लो और भारत की मज़बूत आर्थिक ग्रोथ इन दबावों को कुछ हद तक कम कर रही है। डिजिटल और फिनटेक (Fintech) कंपनियाँ जैसे BookMyForex, Fable Fintech, और EbixCash, साथ ही Paytm और PhonePe, इन पैसों के ट्रांसफर को ज़्यादा कुशल और पारदर्शी बना रही हैं। अमेरिका द्वारा संभावित 1% रेमिटेंस टैक्स का भारत के कुल इनफ्लो पर मामूली असर पड़ने की उम्मीद है।
भविष्य की राह में क्या हैं खतरे?
इन सकारात्मक रुझानों के बावजूद, कुछ जोखिम बने हुए हैं। वैश्विक आर्थिक मंदी से विदेशों में भारतीय श्रमिकों के लिए रोज़गार के अवसर कम हो सकते हैं, जिससे रेमिटेंस की राशि घट सकती है। GCC देशों से आने वाले पैसे पर तेल की कीमतों का असर अभी भी बना हुआ है। वहीं, अमेरिकी इंटरेस्ट रेट्स बढ़ने से भारत से पैसा बाहर जा सकता है, जिससे रुपये पर और दबाव और ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है। हालाँकि, भारत का सेंट्रल बैंक और मज़बूत घरेलू ग्रोथ इन पर काबू पाने में मदद कर सकते हैं। मध्य-पूर्व में संघर्ष भी प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए प्रवाह को बाधित कर सकते हैं।
आगे क्या?
कुल मिलाकर, दुनिया भर में कम और मध्यम आय वाले देशों में रेमिटेंस बढ़ने की उम्मीद है, और भारत के शीर्ष प्राप्तकर्ता बने रहने की संभावना है। इन फंडों की निरंतर वृद्धि और विविधीकरण भारत की वित्तीय स्थिति और आर्थिक स्थिरता को सहारा देना जारी रखेंगे, और देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में एक अहम भूमिका निभाते रहेंगे।
