दुनिया भर की कंपनियाँ अब चीन के अलावा दूसरे मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन की तलाश में हैं, और इसमें भारत तेजी से उभर रहा है। 'Europe Plus One' रणनीति के तहत, यूरोपीय कंपनियाँ यूरोप में बढ़ती एनर्जी कॉस्ट और घटती लेबर सप्लाई जैसी दिक्कतों से जूझ रही हैं। ऐसे में, भारत उनके लिए एक बड़ा और आकर्षक विकल्प बनता जा रहा है।
'Europe Plus One' का बढ़ता असर
वैश्विक सप्लाई चेन में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहाँ 'China Plus One' रणनीति काफी समय से चर्चा में थी, वहीं अब 'Europe Plus One' थीम भी जोर पकड़ रही है। यूरोपीय मैन्युफैक्चरर्स इस वक्त कई बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिनमें आसमान छूती एनर्जी कीमतें, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और बूढ़ी होती आबादी की वजह से लेबर की कमी शामिल है। इन दिक्कतों के चलते, ग्लोबल कंपनियाँ अब ज्यादा किफायती और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश में हैं, और इस दौड़ में भारत एक मजबूत दावेदार के रूप में सामने आ रहा है।
इन सेक्टर्स में दिखेगा बड़ा उछाल
भारत की ओर यह झुकाव कई खास सेक्टर्स के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। फार्मा कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग (CDMOs), स्पेशियलिटी केमिकल्स, एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग जैसे उद्योग इस बदलाव के प्रमुख लाभार्थी बन सकते हैं। इन सेक्टर्स के लिए टेक्निकल स्किल्स और लेबर की उपलब्धता, दोनों ही बहुत जरूरी हैं, और भारत इन दोनों मोर्चों पर खरा उतरता दिख रहा है। यह सिर्फ प्रोडक्शन को शिफ्ट करने की बात नहीं है, बल्कि भारतीय कंपनियों को ग्लोबल वैल्यू चेन का हिस्सा बनाने का मौका है, जो पहले अक्सर पश्चिमी देशों में केंद्रित होती थी।
लंबी दौड़ की चुनौतियाँ
युवा आबादी का फायदा तो भारत को है, लेकिन इस पोटेंशियल को मैन्युफैक्चरिंग लीडरशिप में बदलने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स जैसी बड़ी चुनौतियों से निपटना होगा। भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कितनी तेजी से होता है, लॉजिस्टिक्स कितने एफिशिएंट होते हैं और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' में कितना सुधार होता है। हालाँकि, हाल के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) ने मार्केट एक्सेस को बेहतर बनाया है, लेकिन ये आंतरिक सुधारों का विकल्प नहीं हैं। निवेशकों के लिए, कंपनियों की एफिशिएंसी और ग्लोबल ऑर्डर्स को संभालने की क्षमता ही लंबी अवधि की सफलता तय करेगी।
निवेश में सावधानी
इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स इन मैन्युफैक्चरिंग थीम्स को अपने पोर्टफोलियो में शामिल कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा स्टॉक वैल्यूएशंस को लेकर वे अभी भी सतर्क हैं। मैन्युफैक्चरिंग स्पेस में कंपनियों की बढ़ती मांग ने कई के प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) मल्टीपल्स को बढ़ा दिया है, जिन पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। फंड मैनेजर्स उन सेक्टर्स पर भी ध्यान दे रहे हैं जहाँ कमाई की संभावना ज्यादा स्पष्ट है, जैसे कि हॉस्पिटल्स। कमोडिटी से जुड़े व्यवसायों में सावधानी बरती जा रही है क्योंकि प्राइस साइकिल्स का अनुमान लगाना मुश्किल है। इसके अलावा, आईटी सर्विसेज जैसे कुछ सेक्टर्स पर भी ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उनके बिजनेस मॉडल पर दीर्घकालिक प्रभाव अभी भी अनिश्चित है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए, निवेशकों को कंपनियों की कैपेसिटी एक्सेपेंशन और ग्लोबल इकोनॉमिक वोलैटिलिटी के बावजूद लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए।
